पेशी!
[[श्रेणी : शब्दकोष]] पेशी – Pashi. Muscles. औदारिक शरीर में पाई जाने वाली माँसपेशियाँ “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] पेशी – Pashi. Muscles. औदारिक शरीर में पाई जाने वाली माँसपेशियाँ “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == गुरु : == सं किं गुरु: पिता सुहृदा योऽभ्यसूययाऽर्भं बहुदोषम्, बहुषु वा दोषं प्रकाशयति न शिक्षयति च।। —नीतिवाक्यामृत : ११-५३ वे गुरु, पिता व मित्र निन्दनीय या शत्रु सदृश हैं, जो ईष्र्यावश अपने बहुदोषी शिष्य, पुत्र व मित्र के दोष दूसरों के समक्ष प्रकट करते हैं और उसे…
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विशालप्रभ – Vishalaprabha. Name of the 10th Jaina – Lord of Videh Kshetra (region). विदेह क्षेत्र के १० वें तीर्थकर का नाम “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रतिवादी – Prativaadee. Respondent, defendant. प रतिपक्षी, विपक्षी “
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मैथुन संज्ञा– Maithun Sangya. Sex instinct. 4 संज्ञाओ में एक संज्ञा; मैथुनरूप क्रियाओ में होने वाली इच्छा”
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == तीव्रकषायी : == आत्मप्रशंसनकरणं, पूज्येषु अपि दोषग्रहणशीलत्वम्। वैरधारणं च सुचिरं, तीव्रकषायाणां लिंगानि।। —समणसुत्त : ६०० अपनी प्रशंसा करना, पूज्य पुरुषों में भी दोष निकालने का स्वभाव होना, दीर्घकाल तक वैर की गाँठ को बांधे रखना—ये तीव्रकषाय वाले जीवों के लक्षण हैं।
[[श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[श्रेणी:शब्दकोष]] == कायक्लेश : == सुखेन भावितं ज्ञाने, दु:खे जाते विनश्यति। तस्मात् यथाबलं योगी, आत्मानं दु:खै: भावयेत्।। —समणसुत्त : ४५३ सुखपूर्वक प्राप्त किया हुआ ज्ञान दु:ख के आने पर नष्ट हो जाता है। अत: योगी को अपनी शक्ति के अनुसार दु:खों के द्वारा अर्थात् कायक्लेशपूर्वक आत्म-चिन्तन करना चाहिए।
[[श्रेणी: शब्दकोष]] भेद स्वभाव:Differentiation in nature, discriminative nature of matters. द्रव्योंके 11 सामान्य स्वभावों में एक स्वभाव ; गुण-गुणीआदिमेंसंज्ञा , लक्षण, प्रयोज़ंन की अपेक्षा भेद होने से भेद स्वभाव होताहै “