तद्भाव!
तद्भाव Intrinsic nature. गुण का गुण में अथवा पर्याय में सद्भाव या तद्रूपता ।[[श्रेणी: शब्दकोष ]]
तद्भाव Intrinsic nature. गुण का गुण में अथवा पर्याय में सद्भाव या तद्रूपता ।[[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] निर्वहण – Nirvahana. Acquiring right fait and other virtues with calmness (free from anxiety). सम्यग्दर्शन आदि गुणों को निराकुलतासे धारण करना परीषहादिक आने पर व्याकुल चित्त न होकर सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रय में तत्पर रहना “
तदुभयाधिकरण A type of substratum (underlying basis). अधिकरण का एक भेद जो विष, लवण, क्षार, टिुक, अग्नि आदि दस प्रकार का होता है। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
आसीधिका Omen permission (taken while coming out from a temple etc.). जिन मन्दिर अथवा यति का निवास अथवा मठ से लौटते समय उच्चारण करने का शब्द जिसका अर्थ वहाँ रहने वाले भूत , यक्षादि से पूछकर बाहर आना है इसके लिये असही शब्द का भी प्रयोग होता है।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी : शब्दकोष]] बाह्य शुक्लध्यान – Bahya Sukladhyana. Meditational activity of controlling movements of body organs. आत्मा की वीतरागी अवस्था की बाहरी पहचान; शरीर और नेत्रों को स्पन्द रहित रखना, जंभाई, उदूगार आदि नहीं होना , प्राणापान का प्रचार व्यक्त न होना आदि बाह्य शुक्लध्यान हैं “
तत्वप्रकाशिका A book written by Acharya Yogendudeva. आय योगन्दुदेव (ईत्रशत्र 6) द्वारा रचित तत्वार्थ सूत्र की प्राकृत भाषाबद्ध एक टीका। [[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] निर्मलसागर (आचार्य) – Nirmalasagar (Aachaarya). Name of a saint, the disciple of Acharya Shri VimalsagarMaharaj. आचार्यश्री विमलसागर महाराज (भिण्ड) के शिष्य (ई.श. 20-21), इनकी प्रेरणा से गिरनार सिद्धक्षेत्र का विकास हुआ है”
तत्वार्थरत्नप्रभाकर A book written by Acharya Prabhachandra. आचार्य प्रभाचन्द्र 8 (ई.सन् 1432) द्वारा रचित एक गंथ।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
आहारचर्या A time limit related to Digambar Jain saint-food. श्रावक के द्वारा नवधाभक्तिपूर्वक जैन साधु को आहार के लिए आमंत्रित करने पर साधु द्वारा विधिपूर्वक उनके घर में दिन में एक बार खड़े होकर पाणि पात्र में भोजन लेना दिगम्बर जैन साधु की आहारचर्या कहलाती है।[[श्रेणी:शब्दकोष]]