निश्चय प्रोषधोपवास!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] निश्चय प्रोषधोपवास – Nishchaya Proshadhopavaasa. Engrossment into self with renouncing all kinds of food taking. मुनि अवस्था में चतुर्विध आहार छोड़कर आत्मा के ध्यान में निमग्नहोना “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] निश्चय प्रोषधोपवास – Nishchaya Proshadhopavaasa. Engrossment into self with renouncing all kinds of food taking. मुनि अवस्था में चतुर्विध आहार छोड़कर आत्मा के ध्यान में निमग्नहोना “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भदंत – Bhadamta. Respectful word for addressing great ascetics. जो सब कल्याणों को प्राप्त हों वह भदन्त हैं , साधु का अपरनाम “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] Supreme, Highest state which is originated after the destruction of all Karmas. उत्कृष्ट, समस्त कर्मों का नाश होने पर अपने स्वभाव से जो उत्पन्न है उसे परा कहते है।
[[श्रेणी :शब्दकोष]] यज्ञमित्र–Yagyamitr. Name of the 50th chief disciple of Lord Rishabhdev. तीर्थंकर वृषभदेव के 50वे गणधर का नाम”
गंधदेव A protector deity of Nandishvar dvip (island) and kshaudravar. नन्दीश्वर द्वीप तथा क्षौद्रवर का रक्षक देव । [[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पद्मनंदि: Name of the disciple of Acharya Shri Kunthusagar Maharaj and many other Digamber Jain Acharyas. आचार्यश्री कुंथुसागर जी महाराज के एक प्रसिद्ध षिष्य ( ई0 श0 20-21) । इस नाम से दिगम्बर जैन आम्नाय में अनेको आचर्य हुए है। आचार्य कुंदकुद स्वामी को भी पदमनंदि नाम से जाना जाता है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] शांतिसागर परम्परा – Shantisaagar Paramparaa. The tradition of first Digambar Jain Acharya Charitra Chakravarti Shri Shantisaagarji Maharaj of 20th century, the renovator of Jaina asceticism of new age. बीसवीं सदी के प्रथम दिगम्बर जैनाचार्य चरित्र चक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज ने चूँकि इस युग में मुनिपरम्परा को पुनः जीवंत कर चतुर्विध संघ परम्परा को…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == तीर्थ : == रत्नत्रयसंयुक्त: जीव: अपि, भवति उत्तमं तीर्थम्। संसारं तरति यत:, रत्नत्रयदिव्यनावा।। —समणसुत्त : ५१४ (वास्तव में) रत्नत्रय से सम्पन्न जीव ही उत्तम तीर्थ (तट) है, क्योंकि वह रत्नत्रयरूपी दिव्य नौका द्वारा संसार—सागर को पार करता है।