आत्मा से इच्छाओं का दमन तक आत्मा आत्मा ही सुख और दु:ख को उत्पन्न करनेवाली है ओर उनका क्षय करनेवाली भी है। सन्मार्ग पर चलने वाली अपनी मित्र है और उन्मार्ग पर चलने वाली आत्मा अपनी शत्रु है। आत्मा का स्वरूप आत्मा वास्तव में मन, वचन और कायरूप त्रिदंड से रहित, द्वंद—रहित एकाकी, ममत्व, रहित…
गोपाचल दुर्ग का जैन विद्यापीठ एवं मंदिर पुरावशेष ३ सितम्बर से ५ सितम्बर ९४ के मध्य गोपाचल दुर्ग क्षेत्र उसकी अजेयता, प्राचीनता, ऐतिहासिकता के ८ उज्जव जैन सांस्कृतिक संगम पर एक वर्कशाप कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर में आयोजित की गई थी। इस वर्कशाप में डॉ वी.एन. मुण्डी, उज्जैन का एक शोध आलेख वाचन किया गया, वे…
समयसार भी आत्मा के साथ कर्म का सम्बन्ध मानता है यूँ तो आचार्य श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती ने गोम्मटसार में कहा है— पयडी सील सहाओ, जीवंगाणं अणाइसंबंधो। कणयोवले मलं वा, ताणत्थित्तं सयं सिद्धं।। अर्थात् जीव और कर्म का अनादिकाल से सम्बन्ध चला आ रहा है और यही उनका स्वभाव बन गया है। जिस प्रकार खान से…
षट्पाहुड की पद्यानुवादयुक्त अप्रकाशित पाण्डुलिपि महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’ अष्टापाहुड की प्राचीन पाण्डुलिपियों की प्राप्ति हेतु हमने राजस्थान, दिल्ली, गुजरात, उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश आदि प्रान्तों की शोध यात्राएँ करके पचासों शास्त्र भण्डारों का सर्वेक्षण किया। इसमें हमें पर्याप्त सफलता मिली। किन्तु सीमित अवधि एवं धन में सभी स्थानों का स्वयं जाकर सर्वेक्षण करना सम्भव नहीं होने…
श्रुत पंचमी ऐसे मनायें श्रुत पंचमी’’ जैन संस्कृति का महापर्व है। तीर्थंकरों और गुरुओं के पर्व तो वर्ष में कई बार आते हैं किन्तु मां जिनवाणी का यह पर्व तो वर्ष में एक बार ही आता है तथा प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी को मनाया जाता है। इसका सीधा सम्बन्ध श्रुतावतार के महनीय इतिहास से है।…
‘प्रज्ञा’ और ‘प्रमाण’ का औचित्य लोक में अनेकों प्रसंग ऐसे होते हैं, जहाँ ‘प्रज्ञा’ का प्रयोग अपेक्षित होता है, क्योंकि परिस्थितियाँ या तो अस्पष्ट होती हैं या भ्रमोत्पादक या फिर विपरीत ही बात को सिद्ध कर रही होती हैं; ऐसी स्थिति में व्यकित अपनी प्रज्ञा एवं विवेक के आधार पर निर्णय लेता है। तथा कई…
मार्गणा लेखक—श्री पं. दयाचन्द्रजी सिद्धान्त शास्त्री, सागर जिनमें अथवा जिनके द्वारा जीवों की मार्गणा—खोज की जावे उन्हें मार्गणा कहते हैं। ३४३ राजू प्रमाण लोकाकाश में अक्षय अनन्त जीव राशि भरी हुई है उसे खोजने अथवा उन पर विचार करने के साधनों में मार्गणा का स्थान सर्वोपरि है। यह मार्गणाएँ चौदह प्रकार की होती है— १….
पांडुलिपियों के संरक्षण के कुछ अलक्षित पक्ष सूरजमल बोबरा निदेशक ज्ञानोदय फाउन्डेशन ९/२ स्नेहलता गंज इन्दौर पांडुलिपियों के संरक्षण का महत्त्वपूर्ण कार्य कई माध्यमों से प्रारम्भ हो चुका है और यह एक संतोष की बात है। आशा करना चाहिये कि इन का पंजीकरण शीघ्र हो जायेगा और यथासंभव इन का संरक्षण भी प्रारम्भ हो जायेगा।…
सम्यग्दर्शन का स्वरूप सम्यग्दर्शन के विषय में अध्यात्मवादियों के यहाँ सदा चर्चा चला करती है। वे व्यवहार को अनावश्यक मान गृहस्थ के लिए भी निश्चय सम्यक्त्व आवश्यक सोचते हैं। उस सम्यग्दर्शन के विषय में स्पष्टीकरण आवश्यक है। जैसे धर्म अहिंसा रूप है, यह गौतम गणधर ने प्रतिक्रमण ग्रंथत्रयी में कहा है। उस धर्म के श्रावक…