उदिष्टत्याग!
उदिष्टत्याग-जो अपने घर को छोडकर मुनियों के संघ में जाकर गुरु के पास दीक्षा ग्रहण करते हैं और नवकोटि विशुद्ध भिक्षावृति से आहार ग्रहण करता है निमंत्रण से भोजन नहीं करता है,खंड वस्त्र धारण करता है,वह उदिष्टत्यागी प्रतिमाधारी कहलाता है”
उदिष्टत्याग-जो अपने घर को छोडकर मुनियों के संघ में जाकर गुरु के पास दीक्षा ग्रहण करते हैं और नवकोटि विशुद्ध भिक्षावृति से आहार ग्रहण करता है निमंत्रण से भोजन नहीं करता है,खंड वस्त्र धारण करता है,वह उदिष्टत्यागी प्रतिमाधारी कहलाता है”
सचित्तत्याग-कच्चे फल-फूल,बीज,पत्ते आदि नहीं खाना,इन्हें छिन्न भिन्न करके,लवण आदि मिलाकर या गरम आदि करके प्रासुक बनकर खाना,पानी भी प्रासुक करके पीना सचित्तत्याग प्रतिमा कहलाती है “
भगवान पार्श्वनाथ का सचित्र जीवन प्रस्तुति-प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी भगवान पार्श्वनाथ १०वें भव पूर्व-मरुभूति पोदनपुर में महाराजा अरविन्द अपनी राजसभा में स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान थे। उनके विश्वभूति नामक मंत्री ने राज्य के कुशल समाचार बताकर महाराज से जिनदीक्षा की आज्ञा मांगते हुए अपने पुत्र कमठ और मरुभूति को महाराज के चरणों में…
महावीर की साधना भगवान महावीर की साधना पद्धति का यह दूसरा सूचक यंत्र है। मार्ग चलना जरूर, किन्तु मन में कुछ पाने की आकांक्षा मत रखना। क्योंकि आकांक्षा संसार का हिस्सा है। यदि आत्मन्वेठ्ठाण के मार्ग पर भी आकांक्षा को लेकर गये, सत्य तो जायेगा और आकांक्षा हर जायेगा। आकांक्षा का अर्थ है—स्वयं को धोखा…
अहिच्छत्र तीर्थ का परिचय स्थिति-अहिच्छत्र उत्तरप्रदेश के बरेली जिले की आँवला तहसील में स्थित है। दिल्ली से अलीगढ़ १२६ किमी. तथा अलीगढ़ से बरेली लाइन पर (चन्दौसी से आगे) आँवला स्टेशन १३५ किमी. है। आँवला स्टेशन से अहिच्छत्र क्षेत्र सड़क द्वारा १८ किमी. है। आँवला से अहिच्छत्र तक पक्की सड़क है। स्टेशन पर ताँगे मिलते…
जैनधर्म की प्राचीनता एवं प्रमुख सिद्धान्त भारत की धरती पर प्राचीनकाल से प्रचलित अनेकानेक धर्मों में प्राचीनतम धर्म के रूप में माना जाने वाला जैनधर्म है, जो विशेष रूप से जितेन्द्रियता पर आधारित है। जैनधर्म के प्राचीन मनीषी आचार्यों ने इस धर्म की व्याख्या इस प्रकार की है—‘‘कर्मारातीन् जयतीति जिन:’, ‘‘जिनो देवता यस्यास्तीति जैन:’ अर्थात्…
जाने सांच क्या है पांच १. अणुव्रत (१) अहिंसाणुव्रत (२) सत्याणुव्रत (३) अचौर्याणुव्रत (४) परिग्रह परिमाणाणुव्रत (५) ब्रह्मचर्याणुव्रत २. इंद्रिय (१) स्पर्शन (२) रसना (३) घ्राण (४) चक्षु (५) कर्ण ३. परमेष्ठी (१) अरिहंत (२) सिद्ध (३) आचार्य (४) उपाध्याय (५) साधु ४. पंचमेरु (१) सुदर्शन (२) विजय (३) अचल (४) मंदर (५)…
भगवान महावीर की अमूल्य शिक्षाएं जैन धर्म का मूलमंत्र णमो अरिहंताणं , णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।। धर्म की शाश्वत सत्ता– प्राकृतिक सृष्टि व्यवस्था के अनुसार धर्म की शाश्वत सत्ता मानी गई है। विश्व भर के अनेक धर्मों में जैनधर्म अत्यन्त प्राचीन होते हुए भी इसका कोई संस्थापक नहीं है। जैनधर्म…
महावीर भगवान जो कि चौबीस तीर्थंकर में अंतिम तीर्थंकर हैं” [[भगवान महावीर की जीवनगाथा]]