तीन लोक में सिद्ध जीव कहाँ हैं? अष्टम भूमि – तीन भुवन के मस्तक पर ‘ईषत्प्राग्भार’ नाम की आठवीं पृथ्वी है। यह १ राजु चौड़ी, ७ राजु लम्बी और आठ योजन मोटी है अर्थात् लोक के अन्तपर्यंत है। सिद्ध शिला – इस आठवीं पृथ्वी के मध्य में रजतमयी, श्वेत छत्राकार, मनुष्य-क्षेत्र के समान गोल, पैंतालीस…
महापुराण प्रवचन-७ श्रीमते सकलज्ञान, साम्राज्य पदमीयुषे। धर्मचक्रभृते भत्र्रे, नम: संसारभीमुषे।। महानुभावों! भगवान ऋषभदेव के दशवें भव पूर्व का प्रकरण चल रहा है कि राजा महाबल के मंत्री स्वयंबुद्ध एक बार सुमेरुपर्वत की वंदना करने गये। वहां वंदना करते हुए सौमनसवन के पूर्व दिशा के चैत्यालय में बैठ गये। अकस्मात् ही पूर्व विदेह से युगमंधर भगवान्…
जीव की मानसिक दशा का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण ब्र. विद्युल्लता हीराचन्द शाह(श्राविका संस्था नगर, सोलापुर) श्राविका—संस्थानगर सोलापुर में भगवान महावीर का अति मनोज्ञ मन्दिर है। वहां एक विशाल भित्ति—चित्र बनवाया गया है जिसे देखकर एक जैनेतर धर्मी व्यक्ति ने जिज्ञासा से प्रश्न किया कि ‘‘ यह वृक्ष और ६ आदमियों का चित्र क्यों बनाया गया है?…
जैन धर्म में प्रतिपादित षट्आवश्यकों की प्रासंगिकता भूमिका जैनधर्म को निवृत्ति प्रधान कहकर तथा वेदों को अपौरूषेय एवं ईश्वर को सृष्टिकर्ता न मानने के कारण नास्तिक की संज्ञा दी जाती रही है तथापि आगे के विवेचन से हम देखेंगे कि जैनधर्म में देव, शास्त्र और गुरु की उपासना भक्ति को अत्यधिक महत्त्व दिया गया है…
जो अपने और दूसरों के उपकार के लिए दिया जाता है उसे दान कहते हैं।
आचार्यों ने श्रावकों के देवपूजा , गुरुपास्ति , स्वाध्याय , संयम , तप और दान ये षट् आवश्यक कर्तव्य बताए हैं। उनमें भी आचार्य कुन्दकुन्द ने ‘दाणं पूजा मुक्खो’ दान और पूजा को मुख्य बताया है।
भगवान पार्श्वनाथ एवं उनका अतिशय —श्रीमती आशा जैन, दिल्ली भारत भूमि ऋषि, मुनियों, आर्यिकाओं की भूमि है इसीलिये अनादिकाल से यहाँ जन-जन मंगलकारी अरिहंत, सिद्ध एवं साधुओं की लीला-स्थली के पुनीत धर्मतीर्थों के दर्शन एवं वंदन से संसार ताप-पीड़ित मानव मन आत्म अनुभूति की ओर अग्रसर होने लगता है, पुण्य की प्राप्ति होती है, पाप…
बुद्धि का प्रयोग एक नवयुवक और कुछ बुजुर्ग लकड़हारे जंगल में पेड़ काट रहे थे। युवक बहुत मेहनती था। वह बिना रुके लगातार काम कर रहा था। बाकी लकड़हारे कुछ देर काम करने के बाद थोड़ी देर सुस्ताते और बात करते थे। यह देखकर युवक को लगता था कि वे समय की बर्बादी कर रहे…
[[श्रेणी:मंत्र_संग्रह]] [[श्रेणी:अनेकान्त_पत्रिका_के_लेख]] ==जाप== जकारो जन्म विच्छेद: पकार: पापनाशन: । तमाज्जप इति प्रोक्त: जन्मपापविनाशकम् ।। मन्त्र का जाप करने के लिए सर्वप्रथम आठ प्रकार की शद्धियों का होना आवश्यक है। १. द्रव्य शुद्धि : पंचेन्द्रिय तथा मन को वश कर कषाय और परिग्रह का शक्ति के अनुसार त्याग कर कोमल और दयालु चित्त हो जाप करना।…