जैन वाङ्मय में अष्टमंगल-एक विवेचन
जैन वाङ्मय में अष्टमंगल-एक विवेचन १. प्ररोचना भारतीय परम्परा मंगल और मांगलिक वस्तुओं के सृजन, सम्वद्र्धन और संपादन में सन्यास है। ऐहिक जीवन में पूर्ण मंगल की संस्थापना कर, उसको भोगकर पारलौकिक मंगल में पूर्ण प्रतिष्ठित हो जाना प्रत्येक भारतीय का संकल्प होता है। ‘‘जीवेम शरद: शतम्’’ की रमणीय भावना से विभूषित ऋषि-परम्परा वहां जाना चाहती…