सव्यभिचार!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सव्यभिचार – Savyabhichaara. A vallacy causing both favour & opposition, an inconclusive fallacy. एक हेत्वाभास । पक्ष व विपक्ष दोनों को स्पर्ष करने वाला हेतु । यह साधारण, असाधारण व अनुपसंहारी तीन प्रकार का होता है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सव्यभिचार – Savyabhichaara. A vallacy causing both favour & opposition, an inconclusive fallacy. एक हेत्वाभास । पक्ष व विपक्ष दोनों को स्पर्ष करने वाला हेतु । यह साधारण, असाधारण व अनुपसंहारी तीन प्रकार का होता है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[श्रेणी:शब्दकोष ]] == कर्म-मुक्ति : == पक्के फलम्हि पडिए, जह ण फलं बज्झए पुणो विंटे। जीवस्स कम्मभावे, पडिए ण पुणोदयमुवेइ।। —समयसार : १६८ जिस प्रकार पका हुआ फल गिर जाने के बाद पुन: वृन्त से नहीं लग सकता, उसी प्रकार कर्म भी आत्मा से विमुक्त होने के बाद पुन: आत्मा (वीतराग) को…
जघन्य अंतरात्मा Beings with right faith but not observing vows. तत्त्व श्रद्धा के सात्घ व्रतों को न रखने वाले अविरत सम्यग्दृष्टि जीव ।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
तत्प्रतियोगी knowledge of relative imagination of matters or anything else. यह प्रदेश उस प्रदेश से दूर है इस प्रकार का ज्ञान तत्प्रतियोगी नाम का प्रत्यभिज्ञान कहलाता है। [[श्रेणी:शब्दकोष]]
जघन्यलब्धि Minimum attainments of spiritual virtues (like restraint etc.). जघन्य क्षयोपशम या संयामादि गुणों की प्राप्ति ।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == मुमुक्षु : == मिच्छत्तासवदारं रुंभइ सम्मत्तदिढकवाडेण। हिंसादिदुवाराणि वि, दिढवयफलिहेहिं रुंभति।। —जयधवला : १-१०-५५ मुमुक्षु जीव सम्यक्त्व रूपी दृढ़ कपाटों से मिथ्यात्व रूपी आस्रव द्वार को रोकता है तथा दृढ़ व्रत रूपी कपाटों से हिंसा आदि द्वारों को रोकता है।
जम्बूसामिचरिउ Name of a book written by poet “Veer”. कविवीर द्वारा ई. सन् १०१९ में रचित ग्रन्थ ।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सविपाक उदय – Savipaaka Udaya. Fruition of Karmas on maturity. काल, भव और क्षेत्र का निमित्त पाकर कर्मो का उदय होता है। वह दा प्रकार का है- सविपाक उदय और विपाक उदय । कर्मो का स्थिति पूर्ण होने पर उदय में आना ।
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विरलन राशि – Viralana Rashi. Spreaded numbers in the form of 1. जिस संख्या को एक-एक करके फैला दिया जायें ” जैसे ४ का विरलन होगा १,१,१,१, “