आलुंच्छन!
आलुंच्छन A form of self criticism. आलोचना के 4 स्वरूपों में एक भेद- कर्मरूपी वृक्ष का मूल छेदने में समर्थ ऐसा समभावरूप स्वाधीन निज परिणाम।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
आलुंच्छन A form of self criticism. आलोचना के 4 स्वरूपों में एक भेद- कर्मरूपी वृक्ष का मूल छेदने में समर्थ ऐसा समभावरूप स्वाधीन निज परिणाम।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] बलात्कार गण- जैनाचार्यों की शाखा; कुंदकुंद आचार्य के समय से प्रचलित। जैसा कि प्रशस्ति आदि में लिखित रहता है- कुन्दकुन्दाम्नाये सरस्वती गच्छे बलात्कार गणे………। Balatkara Gana- A branch of jain acharyas
देव भवन Abode of deities. चारों निकायों के देवों के भवन (प्रत्येक भवनों में जिनमंदिर होते हैं)। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] बप्रिला- नमिनाथ भगवान की मााता का नाम। अपरनाम-वप्पिला या वर्मिला। Baprila- Mother’s name of lord Naminath
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भूपाल चतुर्विशतिका टीका – Bhupala chaturvishtika Tika. Name a commentary book written by pandit Ashadhar. पं. आशाधर (ई. ११७३-१२४३) कृत संस्क्रत टीका “
इक्षुरस Juice of sugar cane. गन्ने का रस Sugar-cane juice. गन्ने का रस जिससे शक्कर गुड आदि बनते है। इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने एक वर्ष उन्तालीस दिन के उपवास के पश्चात हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस द्वारा इक्षुरस का प्रथम आहार ग्रहण किया था। Seventh island and ocean of middle universe. मध्यलोक…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] रज – धूल, ज्ञानावरण, दर्षनावरण, कर्म धूलि की तरह वस्तुओ का बोध और अनुभव में प्रतिबंध होने से रज कहलाते है। Raja-sand, Dust, Knowledge obscuring Karmas are also called as dust
[[श्रेणी:शब्दकोष]] बादर सांपरायिक बंधक- निक्षेप की अपेक्षा बंधक का एक भेद। Badara Samparayika Bamdhaka- A type of karmic binder
[[श्रेणी:शब्दकोष]] रूद्रदत्त – भगवान ऋशभदेव के तीर्थ में एक ब्राहमण जो पूजा के लिए प्राप्त द्रव्य से जुआ खेलने के फलस्वरूम सातवें नरक में गया।चारूदत्त का व्यसनी चाचा, चारूदत्त को व्यसनी इसी ने बनाया था। Rudradatta-Name of a Brahmin in the era of lord Rishabhdev who went into 7th hell because of gambling, Name of…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संघात – Sanghaata. Aggregate, Collection, A type of Shrutgyan (scriptual knowledge) related to wholesome increase of knowledge. समूह, जमाव, श्रुतज्ञान के 20 भेदों में 7वां भेद; एक-एक पद के अक्षर की वृद्धि के क्रम से संख्यात हजार पदों के बढ़ जाने पर यह संघात श्रुतज्ञान होता है “