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[[श्रेणी : शब्दकोष]] पृष्ठक – Prsthaka. Name of the 28th patal (layer) & Indrak of saudharma heaven. सौधर्म स्वर्ग के २८ वें पटल व इंद्रक का नाम “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] पृष्ठक – Prsthaka. Name of the 28th patal (layer) & Indrak of saudharma heaven. सौधर्म स्वर्ग के २८ वें पटल व इंद्रक का नाम “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] स्वगुरु स्थापनावाप्ति क्रिया – Svaguru-Sthapanaavaapti kriyaa. A type of auspicious activity, entrusting the responsibility of group by the chief saint to other succeeding saint.गर्भन्वय की 53 क्रियाओ मे 23 वी क्रिया। गुरु की भांति स्वयं भी अवस्था विषेष को प्राप्त हो जाने पर संध से योग्य षिष्य को छांटकर उसे गुरु पद का भार…
उपराग Colour, Coloration, Darkening, Eclipse . रंगीन लाली आदि से युक्त।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == समता : == किं करिष्यति वनवास: कायक्लेशो विचित्रोपवास:। अध्ययनमौनप्रभृतय:, समतारहितस्य श्रमणस्य।। —समणसुत्त : ३५३ समतारहित श्रमण का वनवास, कायक्लेश, विचित्र उपवास, अध्ययन और मौन व्यर्थ है। एक्कु करे मं विण्णिकरि, मं करि वण्ण विसेसु। इक्कइँ देवइं जे वसइ, तिहुयणु एहु असेसु।। —परमात्मप्रकाश : २-१०७ हे जीव ! तू…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] स्याद्भव्यत्व – Syaadbhavyatva. Separate or different entities of matter.द्रव्य के समान 11 स्वभावो मे एक स्वभाव। एक द्रव्य दूसरे द्रव्य रुप नही होता, यह अभव्य स्वभाव है, अतः द्रव्य अपने स्वभाव को नही छोड़ता।
जननाभिषव An auspicious bathing (anointment) of Jaina Lord (Tirthankar). तीर्थंकरों का जन्माभिषेक ।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] स्यादचेतन – Syaadacetana. Exposition of soul as inanimate because of its relationship with karmas, which are inanimate.कर्म अचेतन है एवं जीव से सम्बद्व है, इस दृष्टि से जीवो को अचेतन कह देना।
गुरुवन्दना Belief in false preceptor of spiritual teachers. रत्नत्रयधारक यति, आचार्य, उपाध्याय, साधु आदि के उत्कृष्ट गुणों को जानकर श्रद्धा सहित विनय करना ।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
जन्नाचार्य A Marathi poet and writer of ‘Shrenik Charit’, An epithet of Vishnu. कन्नड़ कवि (ई. ११७०-१२२५) , अनंतनाथ पूरण के रचयिता ।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सहदेवी – Sahadevi. The mother of Sukaushal, a saint. सुकौशल मुनि कामता । सुकौशल के मुनि हो जाने पर पुत्र वियोग से मरकर सिंहनी हुई । पूर्व के क्रोधवष सुकौशल को खा लिया । अंत में सुकौशल के पिता कीर्तिधर (मुनि) से पूर्वभव जानकर पश्चातापपूर्वक देह का त्याग कर स्वर्ग गयी ।