द्रव्य पूजा!
द्रव्य पूजा Physical worship (with 8 reverential materials). पंच परमेष्ठी के सम्मुख भक्ति भाव से जल, चंदन, अक्षत, पुष्य , नैवेद्य, दीप, , धूप व फल रूप श्रेष्ठ अष्ट द्रव्य समर्पित करना।[[श्रेणी: शब्दकोष ]]
द्रव्य पूजा Physical worship (with 8 reverential materials). पंच परमेष्ठी के सम्मुख भक्ति भाव से जल, चंदन, अक्षत, पुष्य , नैवेद्य, दीप, , धूप व फल रूप श्रेष्ठ अष्ट द्रव्य समर्पित करना।[[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == माया : == सच्चाण सहस्साण वि, माया एक्कावि णासेदि। —भगवती आराधना : १३८४ एक माया हजारों सत्यों का नाश कर डालती है। माया तैर्यग्योनस्य। —तत्त्वार्थ सूत्र : ६-२७ माया तिर्यंच योनि को देने वाली है। (तिर्यंच माया के कारण ही बांके होकर चलते हैं।)
द्रव्य नय Physical standpoint. जो दृष्टि या अपेक्षा ‘द्रव्य सामान्य’ को ग्रहण करे। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] भेदज्ञान:Discriminating science (knowledge).जीवादि सातों तत्वों में सुखादि की अर्थात् स्व तत्व की स्वसंवेदनगम्य पृथक् प्रतीति होना ” अथवा स्व पर पदार्थो का यथार्थ ज्ञान होना “
द्रव्य आरोप To characterise a matter into anothers. एक द्रव्य में दूसरे को आरोपित या उपलक्षित करना, जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब को देखकर ‘यह दर्पण की पर्याय है’ ऐसा कहना ।[[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] भृंगनिभा:Name of a vapi(like large lake) of sumeru mountain. सुमेरु के नन्दनादि वनों मेंस्थित एक वापी (बावड़ी) ।
द्युतिश्रुति Name of an Agradevi of Sun. सूर्य की एक अग्रदेवी का नाम।[[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == सामायिक : == तस्स सामाइयं होइ, इइ केवलिभासियं।। —अनुयोगद्वार सूत्र : १२७ जिसकी आत्मा संयम में, नियम में एवं तप में सन्निहित (तल्लीन) है, उसकी सच्ची सामायिक होती है, ऐसी केवली भगवान् ने कहा है। जो समो सव्वभूएसु, तसेसु थावरेसु अ। तस्स सामाइयं होइ, इह केवलिभासिअं।। —अनुयोगद्वार सूत्र…
दैव Accumulation of results of good and bad deeds of past life. भाग्य- प्राणी ने पूर्व भव में जिस पाप या पुण्य कर्म का संचय किया है वह दैव कहा जाता है। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == सदाचारी : == वायाए अकहंता सुजणे, चरिदेहि कहियगाा होंति। —भगवती आराधना : ३६६ श्रेष्ठ पुरुष अपने गुणों को वाणी से नहीं, किन्तु सच्चरित्र से ही प्रकट करते हैं।