स्वस्थान संक्रमंण!
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वस्थान संक्रमंण – Svasthaana Sammkramana. A type of karmic transition. संक्रमण के दो भेदो मे एक भेद। स्वस्थान मे अर्थात् अपने ही अन्य संग्रहकृष्टियो मे संक्रमण करना अर्थात् तद्रूप परिणमन करनां।
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वस्थान संक्रमंण – Svasthaana Sammkramana. A type of karmic transition. संक्रमण के दो भेदो मे एक भेद। स्वस्थान मे अर्थात् अपने ही अन्य संग्रहकृष्टियो मे संक्रमण करना अर्थात् तद्रूप परिणमन करनां।
उदयभावी क्षय Destruction of karmas without their fruition. बिना फल दिये आत्मा से कर्मों का संबंध छूट जान।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == श्रावक : == जो बहुमुल्लं वत्थु, अप्पमुल्लेण णेव गिण्हेदि। वीसरियं पि न गिण्हदि, लाभे थूर्एाह तूसेदि।। — कार्तिकेयानुप्रेक्षा : ३३५ वही सद्गृहस्थ श्रावक कहलाने का अधिकारी है, जो किसी की बहुमूल्य वस्तु को अल्पमूल्य देकर नहीं ले, किसी की भूली हुई वस्तु को ग्रहण नहीं करे और थोड़ा…
[[श्रेणी: शब्दकोष]] स्ववष – Svavasa Own control or self controlled. आत्मवष, जो परभाव को त्यागकर निर्मल स्वभाव वाले आत्मा को ध्याता है वह स्ववष है।
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मूलसंघ–Mulasangh. An ancient group of Digambar Jain saints (associated after the salvation of Lord Mahavira). दिगम्बर जैनसाधुओका प्राचीन संघ; जिनके आचार्यो की पट्टावली में प्रथम श्री कुन्दकुन्द आचार्य का नाम लिया जाता है”
[[श्रेणी :शब्दकोष]] यमपाल चांडाल–Yampal Chaandal. Name of a particular brute (Chandal), great person worshipped by deities for observing vow of non–violence on Chaturdarshi. जिसने चतुर्दशी को हिंसा न करने की प्रतिज्ञा ली थी, हिंसा न करने से देवताओ से पूजित हुआ”
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वर्ग – Svarga. The heaven, aboding place of deities. इसका अपरनाम कल्प है ये ऊध्र्वलोक मे स्थित है। स्वर्ग के दो, विभाग है-कल्प व कल्पातीत। यहाॅ वैमानिक देव रहते है अथवा कल्पोपपन्न व कल्पातीत देवो के रहने के स्थान।
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मिश्र भाव–Mishra Bhav. A kind of reflection related to both destruction & subsidence of Karmas. क्षायोपशामिक भाव, जिसमे कर्मो का क्षय और उपशम दोनों होते है”
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वरक्षा – Svaraksaa. To have right or pure conduct, self defence. शुद्व भाव रखना ही स्वरक्षा अर्थात् आत्मरक्षा है, अहिंसा का सिद्वान्त स्वात्म रक्षा के लिये ही है।