त्रायस्त्रिंश!
त्रायस्त्रिंश Thirty three, A type of deities (33 in number). तैंतीस , 33, देवों के इन्द्र, सामानिक आदि दस भेदों में से एक भेद । इनकी संख्या 33 है। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
त्रायस्त्रिंश Thirty three, A type of deities (33 in number). तैंतीस , 33, देवों के इन्द्र, सामानिक आदि दस भेदों में से एक भेद । इनकी संख्या 33 है। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
गरूड़ Ruling demigod of Jaina Lord Shantinath, 4th Patal (layer) of sanatkumar heaven, Eagle or a large vulture. शांतिनाथ भगवान का शासन यक्ष. सनत्कुमार स्वर्ग का चौथा पटल. एक विशालकाय पक्षी ।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == संयम : == यथा कूर्म: स्वअंगानि, स्वके देहे समाहरेत्। एवं पापानि मेधावी, अध्यात्मना समाहरेत्।। —समणसुत्त : १३७ जैसे कछुवा अपने अंगों को अपने शरीर में समेट लेता है, वैसे ही मेधावी (ज्ञानी) पुरुष पापों को अध्यात्म के द्वारा समेट लेता है। वय समिदि कसायाणं दंडाणं तह इंदियाण पंचण्हं।…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] रात्रिक पूजा – त्रैकालिक पूजा का एक प्रकार अर्थात रात्रि में पूजा करना। सागार धर्मामृत ग्रंथों में श्रावको के लिए तीनों संध्याओं में पूजन करने का विधान है। Ratrika Puja-A kind of Traikalik worshiping, worshiping the lord in night time
गंगदेव Name of an Acharya possessing knowledge of 10 purvas & 11 angas. एक आचार्य जिनका नाम ‘देव’ था , भद्रबाहु प्रथम के पश्चात् दसवें, ११ अंग व पूर्वधारी हुए थे । [[श्रेणी:शब्दकोष]]
आचारांग A part of scriptural knowledge (shrutgyan) containing description about conduct of saints & householdess. जिनवाणी के 12 अंगों में पहला अंग जिसमें मुनि एंव श्रावकों के आचरण का कथन है।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
खलीनित An infraction in the meditative relaxation. कायोत्सर्ग का एक अतिचार; लगाम से पीड़ित घोड़ेवत् मुख को हिलाते हुए खड़े होना । [[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भास्वती – Bhasvati. A Vapi (like large lake) in Amra forest of Samavsharana, assembly of Jaina Lord. समवसरण के आम्र वन की एक वापी “
देवमरण A part of first forest Bhadrashal of Sumeru mountain. सुमेरू पर्वत के प्रथम वन भद्रशाल का एक भाग। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी : शब्दकोष]] पृथिवीकायिक जीव – Prthivikayika Jiva. Earth bodied creature; soul which lives in an earth body. जिस जीव के पृथिवी रूप काय विधमान है उसे पृथिवीकायिक जीव कहते हैं ” जैंसे –पत्थर आदि की खान “