भवनंजय!
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भवनंजय – Bhavanamjaya. A city in the north of Vijayardha (mountain). विजयार्ध की उत्तर श्रेणी का एक नगर “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भवनंजय – Bhavanamjaya. A city in the north of Vijayardha (mountain). विजयार्ध की उत्तर श्रेणी का एक नगर “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] नाना-जीव एक-अजीव – Nana-Jiva Eka-Ajiva Pertaining to different types of living beings and one non-living beings अनेक जीव और एक अजीव ”
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == सत्यवादी : == विश्वसनीयो मातेव, भवति पूज्यो गुरुरिव लोकस्य। स्वजन इव सत्यवादी, पुरुष: सर्वस्य भवति प्रिय:।। —समणसुत्त : ९५ सत्यवादी पुरुष माता की तरह विश्वसनीय, जनता के लिए गुरु की तरह पूज्य और स्वजन की भाँति सबको प्रिय होता है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] वर्गशलाका राशि – Vargashalaakaa Raashi.: Desired resultant quantity of Log2 Log2 (a mathematical operation). दो के वर्ग से लेकर जितनी बार की राशि विवक्षित हो उतनी वर्गशलाका राशि जानना “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पार्श्वस्थ (साधु) – Parsvastha (Sadhu). Saints not observing the duties of a saint life. इंद्रिय, कषाय और विषयों से पराजित होकर चरित्र को तृण के समान समझने वाले मुनि “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] नागहस्ती – Nagahasti Name of great saint. आचार्य पुष्पदन्त एवं भूतबली के समकक्ष के एक मुनि ” व्यग्रहस्ती के शिष्य और जीत्दंड के गुरु (समय ई. 93-162) ”
[[श्रेणी : शब्दकोष]] मय – Mya. Father’s name of Mandodari, A king of Yadav dynasty. मंदोदरीकेपिताकानाम , यदु (यादव) वंशकाएकराजा “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] वरसेना – Varasenaa.: Name of the first chief Aryika (Ganini) in the holy assembly of Lord Vasupujya. भगवान वासुपूज्य के समवशरण में मुख्य आर्यिका (गणिनी) ” अपरनाम ,सेनार्या , सेना “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] न्यायचूलिका – Nyaayachoolikaa. Name of a book written by shri Aklanka Bhatt. श्री अकलंक भट्ट (ई. 640-680) कृत एक न्याय ग्रंथ “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == संघ : == संघो गुणसंघात:, संघश्च विमोचकश्चकर्मणाम्। दर्शनज्ञानचरित्राणि, संघातयन् भवेत् संघ:।। —समणसुत्त : २५ गुणों का समूह संघ है। संघ कर्मों का विमोचन करने वाला है। जो दर्शन, ज्ञान और चारित्र का संघात (रत्नत्रय की समन्विति) करता है, वह संघ है। कर्मरजजलौघविनिर्गतरस्य, श्रुतरत्नदीर्घनालस्य। पंचमहाव्रतस्थिरर्किणकस्स, गुणकेसरवत:।। श्रावकजन—मधुकर—परिवृतस्य, जिनसूर्यतेजोबुद्धस्य। संघपद्मस्य…