उपशम सम्यक्त्त्व!
उपशम सम्यक्त्त्व Subsidential right belief, Subsidential serenity .दर्शन मोहनीय कर्म के उपशम से आत्मा में जो निर्मल श्रद्धान उत्पन्न होता है उसे उपशम सम्यक्त्त्व कहते हैं।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
उपशम सम्यक्त्त्व Subsidential right belief, Subsidential serenity .दर्शन मोहनीय कर्म के उपशम से आत्मा में जो निर्मल श्रद्धान उत्पन्न होता है उसे उपशम सम्यक्त्त्व कहते हैं।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भाव अप्रतिक्रमण – Bhava Apratikramana. To have attachment with the past passionate volitions. अतीत काल में हुए रागादि भाव को वर्तमान में अच्छा जानना, उनका संस्कार एंव उनके प्रति ममत्व भाव रहना “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] वास्तुविधान – Vaastuvidhaana.: A special kind of worshipping to be observed specially on the completion of the construction of temple or home for its auspiciousness. मंदिर,मकान आदि की पूर्णता पर उसमें किया जाने वाला एक विशेष पूजा अनुष्ठान ,इसमें वास्तु-भवन के रक्षक देवताओं को आव्हान करके उन्हें संतुष्ट किया जाता है ताकि भवन में…
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भक्तकथा – Bhaktakatha. Conversation describing about delicious food. विकथा का एक भेद – भोजन कथा; अनेक प्रकार के अशन पान (भोजन) संबंधी गुणदोषों की वार्ता में लिप्त रहना “
एकपदार्थस्थित्व Contents of a matter, Unified, Indistinct. महासत्ता की अवान्तर सत्ता अर्थात् सर्वपदार्थ स्थित्व का सप्रतिपक्ष धर्म।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
उत्तरमुख Turned towards north. कायोत्सर्ग सामायिक आदि शुभकार्य उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मुक्तागिरी(तीर्थ)–Muktagiri (Tirtha). Name of a Digambara Jaina place of pilgrimage in Baitul dist. Of Madhya Pradesh from where three and a half crore Munis (saints) got salvation. It’s another name is Medhagiri. मध्य प्रदेश में स्थित सिद्धक्षेत्र; यहा सेसाढ़े तीनकरोड़ मुनि ‘ मोक्ष’ पधारे है, इसेमेढ़ागिरी भी कहते है”
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पुन्नात संघ – Punnata Samgha. A group of Acharyas formed by Acharya Arhadvali. आचार्य अर्हव्दलि द्वारा स्थापित मुनियों के एक संघ का नाम “
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मेघचंद्र–Meghachndra. Name of many Jain Acharyas. कई जैनाचार्य के नाम” नंदिसंघ बलात्कार गण में माणिक्य नंदी के शिष्यतथा शांति कीर्ति के गुरु (समय–शक601–627). नंदिसंघदेशीयगण में सकलचन्द्र के शिष्य वीरनंदी तथाशुभचंद्र के गुरु (समय– ई. 1020–1110)”