प्रथम परिच्छेद पद्यानुवादकर्त्री- श्रीमती त्रिशला जैन (लखनऊ) नम: श्री वर्धमानाय निर्धूत कलिलात्मने । सालोकानां त्रिलोकानां यद्विद्या दर्पणायते ।। १. मंगलाचरण ज्ञानावरणादिक पापकर्म आत्मा से नष्ट किए जिनने। उन वीरप्रभु को नमन करूं सालोक—त्रिलोक ज्ञान जिनके।। जैस चक्षु दर्पण को लख निजमुख अवलोकन करता है। वैसे केवलज्ञानी आत्मा में सारा जगत झलकता है।। जिन्होंने सम्पूर्ण कर्म…
दिन रात्रि के विभाग का क्रम प्रथम गली में सूर्य के रहने पर उस गली की परिधि (३१५०८९ योजन) के १० भाग कीजिये। एक-एक गली में २-२ सूर्य भ्रमण करते हैं। अत: एक सूर्य के गमन सम्बन्धी ५ भाग हुये। उन ५ भागों में से २ भागों में अंधकार (रात्रि) एव ३ भागों में प्रकाश…
शीलधुरंधर सेठ सुदर्शन लेखिका – गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी मुनिराज उस निर्जन वन में एक शिला पर योगमुद्रा में स्थित है । आगम के प्रकाश में अंतःचक्षु के द्वारा वे अपनी आत्मा को देखने का प्रयत्न कर रहे है । ऐसी भयंकर शीत ऋतु में वे नग्न दिगम्बर मुनि धैर्यरूपी कंबल ओढ़ रहे है और…
पूज्य माता जी द्वारा इस पुस्तक में सर्वप्रथम ध्यान का लक्षण ध्यान कहां करें, कैसी मुद्रा हो ,कैसे शुभारंभ करें इस बात को बताते हुए पिंडस्थ ध्यान की पांच धारणाओं का बहुत सुंदर वर्णन किया गया है ,रूपस्थ ध्यान में समवसरण के ध्यान को बताया गया है, और साथ ही ध्यान के सूत्रों का भी वर्णन किया गया है ।
इस पुस्तक में प्राणायाम एवं सूक्ष्मयोगासन की 16 विधियों का भी वर्णन किया गया है।
इस पुस्तक को पढ़कर ध्यान प्राणायाम योगासन करके अपने जीवन को स्वस्थ रखें यही मंगल कामना है।
[[श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष]] == अनशन : == मासे मासे तु यो बाल:, कुशाग्रेण तु भुङ्क्ते। न स स्वाख्यातधर्मस्य, कलामर्घति षोडशीम्।। —समणसुत्त : २७३ जो बाल (परमार्थशून्य अज्ञानी) महीने—महीने के तप करता है और (पारणे में) कुश के अग्रभाग जितना (नाममात्र का) भोजन करता है, वह सुआख्यात धर्म की सोलहवीं कला को भी नहीं पा…
श्रावण कृण्णा एकम को इस चैत्यभक्ति की रचना हुई है। इसी दिन श्री गौतम स्वामी ने गणधर पद प्राप्त किया, और भगवान महावीर स्वामी की दिव्यध्वनि खिरी थी।
अनेक कथनों से सिद्ध होता है कि चैत्यभक्ति भगवान महावीर स्वामी के प्रथम दिव्यध्वनी के समय की रचना है ।
श्री गौतमस्वामी के मुखकमल से निर्गत चतुर्थ कालीन चार रचनाएं हैं चैत्यभक्ति, दैवसिक प्रतिक्रमण, पाक्षिकप्रतिक्रमण, श्रावक प्रतिक्रमण, इन भक्तियों का पद्यानुवाद पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने करके लोगों को सुलभता से पढ़ने का अवसर प्रदान किया है ।
इस पुस्तक को पढ़कर अपने जीवन को धन्य करें, यही मंगल भावना है|
परम पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की मौलिक कृति २४ तीर्थंकर स्तुति में भगवान आदिनाथ से लेकर महावीर स्वामी पर्यंत चौबीसों तीर्थंकर की स्तुतियाँ हैं जो कि प्रत्येक भक्त को भक्ति की प्रेरणा प्रदान करती हैं | इन स्तुतियों में एकाक्षरी से लेकर ३२ अक्षरी छंद का प्रयोग माताजी ने किया है | शम्भु छंद में रचित इन स्तुतियों में प्रत्येक तीर्थंकर के नाम, माता- पिता के नाम , जन्मनगरी आदि सम्पूर्ण इतिहास भरा हुआ है | इन विशिष्टताओं के साथ-साथआध्यात्मिक आनंद और वैराग्य रस से ओत-प्रोत ये सभी स्तुतियाँ अपने आपमें सर्वांगीण होने से मानो उत्तरपुराण का अध्ययन करा देती हैं |
वास्तव में इन स्तुतियों में कल्पवृक्ष सरीखी अचिंत्य शक्ति है जिसके पठान- श्रवण से चौबीसों तीर्थंकर के बारे में जानकर उनका गुणानुवाद कर आप सभी महान पुण्य का अर्जन करें |