02. दर्शनविशुद्धि भावना
दर्शनविशुद्धि भावना दर्शनविशुद्धि भावना जिनोपदिष्टे निर्ग्रन्थे मोक्षवर्त्मनि रुचि: नि:शंकितत्वाद्यष्टांगा दर्शनविशुद्धि:।।१।। जिनेन्द्र देव के द्वारा उपदिष्ट निर्ग्रंथ दिगम्बर मोक्षमार्ग में रुचि होना और नि:शंकित आदि आठ अंगों का पालन करना दर्शनविशुद्धि है। इहलोक, परलोक, व्याधि, मरण, अगुप्ति, अत्राण और आकस्मिक इन सात प्रकार के भयों से रहित होना नि:शंकित है अथवा अर्हंत देव के द्वारा कथित…