10. वेदमार्गणा
वेदमार्गणा (दशम अधिकार) वेद का स्वरूप पुरिसिच्छिसंढवेदोदयेण पुरिसिच्छिसंढओ भावे। णामोदयेण दव्वे, पाएण समा कहिं विसमा।।८३।। पुरुषस्त्रीषण्ढवेदोदयेन पुरुषस्त्रीषण्ढा: भावे। नामोदयेन द्रव्ये प्रायेण समा: क्वचिद् विषमा:।।८३।। अर्थ—पुरुष, स्त्री और नपुंसक वेदकर्म के उदय से भावपुरुष, भावस्त्री, भावनपुंसक होता है और नामकर्म के उदय से द्रव्यपुरुष, द्रव्यस्त्री, द्रव्यनपुंसक होता है। सो यह भाव वेद और द्रव्य वेद प्राय:…