श्री छोटेलाल जी का परिचय जहाँ हम महामना महापुरुषों का वन्दन कर, उनका गुणानुवाद कर अपने जन्म को सार्थक समझते हैं, वहीं एक बार हमारा मस्तक उन भव्यात्माओं के जन्मदाता माता-पिता के लिए भी झुकता है, क्योंकि जिस प्रकार वृक्ष के हरे-भरे एवं फलदार होने में उसकी जड़ की मुख्यता है, जिस प्रकार किसी भी…
आहार मार्गणा ( गोम्मटसार जीवकाण्ड के आधार से ) (उन्नीसवाँ अधिकार) आहार का स्वरूप उदयावण्णसरीरोदयेण तद्देहवयणचित्ताणं। णोकम्मवग्गणाणं, गहणं आहारयं णाम।।१६२।। उदयापन्नशरीरोदयेन तद्देहवचनचित्तानाम्। नोकर्मवर्गणानां ग्रहणमाहारकं नाम।।१६२।। अर्थ—शरीरनामा नामकर्म के उदय से देह—औदारिक, वैक्रियक, आहारक इनमें से यथासंभव किसी भी शरीर तथा वचन और द्रव्य मनरूप बनने के योग्य नोकर्मवर्गणाओं का जो ग्रहण होता है उसको आहार…
मध्यप्रदेश के पुरातत्व संग्रहालयों में संग्रहीत जैन पुरातत्व प्रतिमाएँ (मध्यप्रदेश पुरातात्विक दृष्टि से सर्वाधिक सम्पन्न सांस्कृतिक प्रदेश है। प्रदेश के संग्रहालयों में उपलब्ध जैन प्रतिमाओं को केन्द्रित कर यह धारावाहिक आलेख प्रस्तुत किया जा रहा है। पूर्व आलेख में गूजरी महल संग्रहालय, ग्वालियर, पिछोर संग्रहालय एवं दिगम्बर जैन संग्रहालय—उज्जैन, की विशिष्ट प्रतिमाओं के विषय में,…
चक्रवर्ती वज्रनाभि जम्बूद्वीप से पूर्व विदेह में पुष्कलावती देश है। उसकी पुण्डरीकिणी नगरी में राजा वङ्कासेन राज्य करते थे जो कि तीर्थंकर थे। उनकी रानी का नाम श्रीकांता था। सुविधि राजर्षि, जो कि अच्युतेन्द्र हुए थे, उनका जीव स्वर्ग से चयकर श्रीकांता रानी के ‘वज्रनाभि’ नाम का पुत्र हुआ। पहले कहे हुए सिंह, सूकर, वानर…
राष्ट्र कल्याण में श्रावक की भूमिका जैन धर्मानुसार व्रतधारियों की दो कोटियाँ हैं— (१) महाव्रती—मुनि और (२) अणुव्रती श्रावक आचार्य उमास्वामी: तत्वार्थ सूत्र ७/२ श्रावक वह सद्गृहस्थ होता है जो सप्त व्यसनों का त्यागी, अष्ट मूलगुणधारी और पंच—अणुव्रतों का पालक होता है। उसका आचरण शास्त्र सम्मत एवं स्वपर हितैषी होता है। द्यूत, (जुआ खेलना), मांस…
सम्मेदशिखर व्रत विधि सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र शाश्वत तीर्थ है। यहाँ से हमेशा चतुर्थकाल में तीर्थंकर भगवान एवं असंख्यातों मुनिगण मोक्ष प्राप्त करते रहे हैं और आगे भी मोक्ष प्राप्त करते रहेंगे। इस सिद्धक्षेत्र के २५ व्रत हैं। इस बार चतुर्थकाल में हुण्डावसर्पिणी के निमित्त से सम्मेदशिखर पर्वत से २० तीर्थंकर ही मोक्ष गये हैं, शेष चार…
समयसार का सार (भूमिका) समयसार की गाथा संख्या और टीकायें— वर्तमान में इस समयसार ग्रन्थ पर दो टीकायें उपलब्ध हैं। एक श्री अमृतचंद्रसूरि की, दूसरी श्री जयसेनाचार्य की । पहली टीका का नाम आत्मख्याति है और दूसरी का नाम ‘‘तात्पर्यवृत्ति’’ है। श्रीअमृतचंद्रसूरि ने जीवाजीवाधिकार को सम्मिलितरूप से लिया है। पुन: कर्तृकर्म अधिकार, पुण्यपाप अधिकार, आस्रव…
विद्यार्थी परीक्षा की तैयारी कैसे करें बौद्धिक विकास के लिये प्रारम्भ में सरल और धीरे—धीरे जटिल प्रक्रिया अपनानी चाहिये। कोई भी काम सीखें या करें, उसकी शुरुआत हमेशा सरल चीजों से की जानी चाहिये और धीरे—धीरे कठिन चीजों की ओर बढ़ना चाहिये । इससे मस्तिष्क एक निश्चित गति से काम करता है और उस पर…