31. चौबीस तीर्थंकरों की पंचकल्याणक तिथियाँ का चार्ट
चौबीस तीर्थंकरों की पंचकल्याणक तिथियाँ का चार्ट
चौबीस तीर्थंकरों की पंचकल्याणक तिथियाँ का चार्ट
सम्मेदशिखर टोंक से मुक्ति प्राप्त मुनियों की संख्या का चार्ट
१. मिथ्यात्व गुणस्थान मिथ्यात्व के उदय से होने वाले तत्त्वार्थ के अश्रद्धान को मिथ्यात्व कहते हैंं। इसके पाँच भेद हैं—एकांत, विपरीत, विनय, संशय और अज्ञान अथवा गृहीत और अगृहीत के भेद से मिथ्यात्व के दो भेद भी होते हैं। इन्हीं में संशय को मिला देने से तीन भेद भी हो जाते हैं। विशेष रूप से…
१२. क्षीणमोह गुणस्थान मोहनीय कर्म के सर्वथा नष्ट हो जाने से क्षीणकषाय मुनि निर्ग्रंथ वीतराग कहलाते हैं ।
[[श्रेणी:गौतम_गणधर_स्वामी]] ==गौतम गणधर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगता== (1) center”800px”]] ==(2)== center”800px”]] ==(3) श्री का श्र == center”800px”]] ==(4)गौतम गणधर== center”800px”]] ==(5)== center”800px”]] ==(6)== center”800px”]] ==(7)== center”800px”]] ==(8)== center”800px”]] ==(9)== center”800px”]] ==(10)== center”800px”]] ==(11)== center”800px”]] ==(12)== center”800px”]] ==(13)== center”800px”]] ==(14)== center”800px”]]
८. अपूर्वकरण गुणस्थान अध:प्रवृत्तकरण में अंतर्मुहूर्त रहकर ये मुनि प्रतिसमय अनंतगुणी विशुद्धि को प्राप्त होते हुए एवं पूर्व में कभी भी नहीं प्राप्त हुए ऐसे अपूर्वकरण जाति के परिणामों को प्राप्त होते हैं । यहाँ पर एक समयवर्ती मुनियों के परिणामों में सदृशता और विसदृशता दोनों ही होती है । इसका काल भी अंतर्मुहूर्त है…
चौदह गुणस्थान बीस प्ररूपणाओं द्वारा अथवा बीस प्रकरणों का आश्रय लेकर यहाँ जीवद्रव्य का प्ररूपण किया जाता है। ‘‘जीवट्ठाण’’ नामक सिद्धांतशास्त्र में अशुद्ध जीव के १४ गुणस्थान, १४ मार्गणा और १४ जीवसमास स्थानों का जो वर्णन है वही इसका आधार है। संक्षेप रुचि वाले शिष्यों की अपेक्षा से बीस प्ररूपणाओं का गुणस्थान और मार्गणा इन…
१४. अयोगकेवली गुणस्थान सयोगकेवली योग निरोध कर चौदहवें गुणस्थान में अयोगी-केवली कहलाते हैं। पहले, दूसरे, तीसरे गुणस्थान तक बहिरात्मा, चौथे से बारहवें तक अंतरात्मा एवं तेरहवें, चौदहवें में परमात्मा कहलाते हैं। आयु कर्म के बिना शेष सात कर्मों की गुणश्रेणी निर्जरा का क्रम—सातिशयमिथ्यादृष्टि, सम्यग्दृष्टि, श्रावक, विरत, अनंतानुबंधी के विसंयोजक, दर्शनमोह के क्षपक, कषायों के उपशामक,…
५. देशविरत गुणस्थान यहाँ पर प्रत्याख्यानावरण कषाय का उदय रहने से पूर्ण संयम नहीं होता किन्तु अप्रत्याख्यानावरण कषाय का उदय रहने से एक देशव्रत होते हैं अत: इस पंचम गुणस्थान का नाम देशसंयम है। इसमें त्रसवध से विरति और स्थावर वध से अविरति ऐसे विरताविरत परिणाम एक समय में रहते हैं अत: यह संयमासंयम गुणस्थान…