क्षुल्लिका वीरमती जी की आर्यिका दीक्षा (ज्ञानमती माताजी की आत्मकथा) आचार्यश्री के निकट पुनः एक दिन मैंने प्रार्थना की कि-‘‘हे गुरुदेव! अब हमें महावीर जयंती पर आर्यिका दीक्षा दे दीजिये।’’ महाराज जी ने साधुओं से परामर्श किया। सभी साधु एक स्वर से मेरे पक्ष में थे अतः महाराज जी ने ब्र. सूरजमल को बुलाया और…
समणसुत्तं में प्रतिपादित ज्ञान-मीमांसा तीर्थकर महावीर के २५०० वें निर्वाण वर्ष की अनेक उपलब्धियें में ‘समणसुत्तं ‘ जैसा आगम शास्त्र एक स्थायी सर्वमान्य महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है । दिगम्बर-श्वेताम्बर दोनों ही परम्पराओं के प्राकृत आगमों से विषयानुसार गाथायें चयनकर इसे पूज्य जिनेन्द्र वर्णी जी ने भूदान और गांधीवादी एवं सर्वोदयी चिंतनधारा के लिये समर्पित राष्ट्रसंत विनोबा…
आस्रव स्वरूप और कारण संसार—भ्रमण के प्रमुख हेतु आस्रव और बन्ध हैं। कारण के बिना कार्य की उत्पत्ति नहीं हाती है। इसलिए संसाररूपी कार्य को जानने के लिए उसके कारण आस्रव एवं बन्ध को जानना आवश्यक है। आस्रव पूर्वक बन्ध होता है आस्रव को समझने के लिए आस्रव के कारणों पर विचार किया जा रहा…
रत्नत्रय धर्म लेखक—उपाध्याय श्री भरतसागर महाराज संघस्थ आ. श्री विमलसागर जी महाराज संसार की प्रत्येक वस्तु का अपना स्वभाव है, धर्म है। धर्म प्राणी मात्र के लिये है। आज मानव—मस्तिष्क में प्रश्न है कि धर्म क्या चीज है ? कार्ल माक्र्स ने धर्म को अफीम की गोली बताया, किसी ने इसे पाखण्ड माना, अनेक लोगों…
जैन धर्म ‘‘कर्मारातीन् जयतीति जिन:’’ जो कर्मरूपी शत्रुओं को जीत लेता है वह ‘‘जिन’’ है। और ‘‘जिनो देवता अस्येति जैन:’’ जिन हैं देवता जिसके वह ‘‘जैन’’ कहलाता है। ‘‘संसार दु:खत: सत्वान् यो उत्तमे सुखे धरतीति धर्म:’’ जो संसार के दु:ख से जीवों को निकाल कर उत्तम सुख में पहुँचता है वह धर्म है। इस प्रकार…
भगवान महावीर का जीवन दर्शन विश्व शांति की अमर देन अनादिकाल से विश्व की परम्परा विद्यमान है। प्रवाहमान जगम क्रम में जैन शासन भी अपने में अनादि है। अनंत अनंत तीर्थंकरों की अपेक्षा से यह जैन शासन अनादि है। प्रत्येक तीर्थंकर की अपेक्षा से इसका तत्वर्ती प्रारंभ माना जा सकता है। जैन शासन का दीप…
मानसिक रोग की चिकित्सा दिगम्बर जैन साधु के दर्शन द्वारा एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण रोहिणी (काल्पनिक नाम) अपने विद्यालय की एक प्रतिभा सम्पन्न छात्रा थी। हर कक्षा में वह प्रथम स्थान प्राप्त करती थी। कक्षा १० में बोर्ड की परीक्षा में उसने प्रथम स्थान प्राप्त किया। परन्तु कक्षा १२ में उसे केवल मात्र २ अंक कम…
दस धर्म महत्त्व सिद्धिप्रासादनि:श्रेणी-पंक्तिवत् भव्यदेहिनाम्। दशलक्षणधर्मोऽयं, नित्यं चित्तं पुनातु न:।।१।। भव्य जीवों के सिद्धिमहल पर चढ़ने के लिये सीढ़ियों की पंक्ति के समान यह दशलक्षणमय धर्म नित्य ही हम लोगों के चित्त को पवित्र करे। उत्तम क्षमा धर्म सर्वं यो सहते नित्यं क्षमादेवीमुपास्य स:। पाश्र्ववत् जायते जित्वोपसर्गांश्च परीषहान्।।१।। शांति:किं स्यात्व्रुधाकिं नु नश्येत् वैरं हि…