श्री अरनाथ भगवान इसी हस्तिनापुर नगरी में सोमवंश में उत्पन्न हुए राजा सुदर्शन राज्य करते थे। उनकी मित्रसेना नाम की रानी थी। रानी ने फाल्गुन कृष्णा तृतीया के दिन गर्भ में अहमिन्द्र के जीव को धारण किया, उसी समय देवों ने आकर गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया। रात्री मित्रसेना ने नवमास के बाद मगसिर शुक्ल चतुर्दशी के…
गणिनी ज्ञानमती प्रश्नोत्तरी प्रस्तुति-आर्यिका सम्मेदशिखरमतीजी एवं आर्यिका कैलाशमती जी प्रश्न १—बीसवीं सदी की प्रथम बालब्रह्मचारिणी आर्यिका कौन—सी हैं ?उत्तर—गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी। प्रश्न २—इनका जन्म कहाँ हुआ है ?उत्तर—इनका जन्म उत्तर प्रदेश में बाराबंकी जिले के टिकैतनगर ग्राम में हुआ। प्रश्न ३—गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का जन्म किस सन् में हुआ ?उत्तर—गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती…
जैनं जयतु शासनम् -नमोऽस्तु शासनम् – एक अनुचिन्तन —गणिनी ज्ञानमती माताजी मूलाचार ग्रन्थ में टीका में ‘‘नमोऽस्तूनां शासने’’ पद आया है । उसका अर्थ मैंने ऐसा किया है— तित्थस्स—तीर्थस्य शासनस्य । मइलणा—मलिनत्वं नमोस्तूनां शासने एवंभूता: सर्वेऽपीति मिथ्यादृष्ट्यो वदन्ति । ‘‘तीर्थ का अर्थ शासन है । जिनेन्द्रदेव के शासन को ‘नमोऽस्तु शासन’ कहते हैं अर्थात् इसी…
आगम के आलोक में वर्ण-गोत्र आदि की स्थिति -आचार्यकल्प १०८ श्री श्रुतसागर जी महाराज ( समाधिस्थ ) इस हुण्डावसर्पिणी काल में भगवान आदिनाथ ने जिस समय वर्णों का विधान किया था, उस समय जीवों के पिण्ड की अशुद्धता रूप संकरता नहीं थी अर्थात् पिण्ड शुद्ध ही था। शनै: शनै: जब विषयासक्ति और विलासिता बढ़ी तो…
गृहचैत्यालय के आगमप्रमाण यह आलेख परमपूज्य आचार्य श्री विद्यानन्दजी मुनिराज की डायरी से परमपूज्य एलाचार्य श्री प्रज्ञसागरजी मुनिराज द्वारा संपादित किया गया है । आशा है इसे पढ़कर सुधी पाठकों की जिज्ञासाओं का समाधान होगा। १. जिज्ञासा : घर में चैत्यालय; स्थापना कर सकते हैं क्या ? समाधान : शास्त्रों में घर में चैत्यालय की…
श्रावक त्रेपनक्रिया व्रत विधि श्रावकों के लिए त्रेपन क्रियाओं का रयणसार आदि ग्रंथों में विधान है। इनके व्रत की विधि व्रत तिथि निर्णय में कही गई है। इसमें ८ मूलगुण, १ रात्रिभोजन त्याग, १ जलगालन, १ साम्यभाव, ५ अणुव्रत, ३ गुणव्रत, ४ शिक्षाव्रत, ४ दान, ११ प्रतिमा, १२ तप और ३ रत्नत्रय, ऐसे त्रेपन क्रियाओं…
प्राण सुदर्शन-गुरु जी! आज पड़ोस में एक आदमी के मरने से लोगों ने कहा-इसके प्राण निकल गये। सो प्राण क्या है? अध्यापक-हाँ सुनो! जिसके सद्भाव से जीव में जीवितपने का और वियोग होने पर मरणपने का व्यवहार है, उनको प्राण कहते हैं। प्राण के दस भेद हैं-स्पर्शन आदि पाँच इन्द्रियाँ, मनोबल, वचनबल, कायबल, (ये तीन…
चतुर्णिकाय देव त्रिशला-माताजी! आज शास्त्र में पढ़ा है कि चतुर्निकाय के देव भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं, वे कौन हैं और कहाँ रहते हैं? आर्यिका-पुण्यरूप देवगति नामकर्म के उदय से जो देवपर्याय को प्राप्त करते हैं उन्हें देव कहते हैं। इनके चार भेद हैं-भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिक। पहली रत्नप्रभा पृथ्वी के तीन…