भवसागर :!
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:सूक्तियां ]] == भवसागर : == व्याधिजरामरणमकरो, निरन्तरोत्पत्ति—नीर निकुरुम्ब:। परिणामदारुणदु:ख:, अहो ! दुरन्तो भवसमुद्र:।। —समणसुत्त : ५१३ अहो ! यह भवसमुद्र दुरन्त है—इसका अन्त बड़े कष्ट से होता है। इसमें व्याधि तथा जरा—मरण रूपी अनेक मगरमच्छ हैं, निरन्तर उत्पत्ति या जन्म ही जलराशि है। इसका परिणाम दारुण दु:ख है।