16. चार आश्रम
चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और भिक्षुक जैनों के ये चार आश्रम होते हैं, ऐसा सप्तम उपासकाध्ययन अंग में बताया गया है ।
चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और भिक्षुक जैनों के ये चार आश्रम होते हैं, ऐसा सप्तम उपासकाध्ययन अंग में बताया गया है ।
[[श्रेणी:श्रावक_के_तीन_भेद]] == साधक श्रावक == साधक श्रावक कब होता है?-‘नैष्ठिक श्रावक, ग्यारह प्रतिमा वाला अंतिम ग्यारहवीं प्रतिमा में साधक कहलाता है ।
श्रावक के तीन भेद श्रावक के तीन भेद हैं- पाक्षिक, नैष्ठिक और साधक। पक्ष, चर्या और साधन के द्वारा ये तीन भेद हुए हैं।’’ अभ्यासरूप से अष्टमूलगुण आदि का पालन करना, देव, धर्म, गुरु का पक्ष रखना पक्ष है। कृष्यादि आरंभजन्य पापों को दूर करने के लिए पुत्रादि के ऊपर घर का भार छोड़कर प्रतिमारूप…
[[श्रेणी:चार_आश्रम]] == वानप्रस्थ आश्रम == जो दिगम्बर रूप को धारण न करके खंडवस्त्र को धारण करते हैं अर्थात् क्षुल्लक, ऐलक अवस्था में रहते हैं, वे वानप्रस्थ कहलाते हैं।
श्रावकों की त्रेपन क्रियाएँ ८ मूलगुण, १२ व्रत, १२ तप, १ समता, ११ प्रतिमा, ४ प्रकार का दान, १ जलगालन, १ रात्रि भोजन त्याग, ३ दर्शन, ज्ञान और चारित्र इस प्रकार श्रावक की त्रेपन क्रियाएं हैं ८+१२+१२+१+११+४+१+१+३=५३
[[श्रेणी:धर्म_के_लक्षण]] == सम्यग्ज्ञान == संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय रहित पदार्थों का जानना सम्यग्ज्ञान है। इसके ग्यारह अंग, चौदह पूर्व रूप से भेद माने गये हैं अथवा प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग के भेद से चार भेद माने हैं। इन चारों अनुयोगों में सम्पूर्ण द्वादशांग का सार आ जाता है। प्रथमानुयोग-किसी एक महापुरुष के चरित का…
सम्यग्दर्शन ‘‘सच्चे देव, शास्त्र, गुरु का तीन मूढ़ता रहित, आठ गर्व से रहित और आठ अङ्ग सहित श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है।’’ अथवा- ‘‘तत्त्वों का यथार्थ श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है।’’ अथवा- ‘‘जिनके आठ मद, तीन मूढ़ता, छह अनायतन, आठ शंकादि दोष, सात व्यसन, सात प्रकार के भय और पाँच अतीचार ये चवालीस दोष नहीं हैं, वे…
[[श्रेणी:धर्म_के_लक्षण]] == तीन गुणव्रत == पांच अणुव्रतों की रक्षा करने के लिए या उनकी वृद्धि के लिए तीन गुणव्रत होते हैं-दिग्व्रत, अनर्थदण्ड व्रत और भोगोपभोग परिमाण व्रत । दिग्व्रत-सूक्ष्म पाप के निराकरण के लिए मरणपर्यंत दशों दिशाओं की मर्यादा करके उसके बाहर नहीं जाना दिग्व्रत है । अनर्थदण्डव्रत-दिशाओं की मर्यादा के भीतर निष्फल पापोपदेश आदि…
[[श्रेणी:धर्म_के_लक्षण]] == अतिचार कितने हैं ? == तत्त्वार्थ सूत्र की सातवीं अध्याय में सम्यक्त्व के पाँच अतिचार, बारह व्रतों के पाँच-पाँच अतिचार तथा सल्लेखना के पाँच अतिचार ऐसे ५±१२²५±५·७० अतिचार होते हैं। इन अतिचारों का प्रकरण वहीं से देख लेना चाहिए।
[[श्रेणी:धर्म_के_लक्षण]] == सम्यक्चारित्र == दर्शनमोहरूपी अंधकार के नाश (उपशम, क्षय या क्षयोपशम) होने पर सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हो जाने से जिसको सम्यग्ज्ञान प्रगट हो गया है, ऐसा भव्यजीव रागद्वेष को नष्ट करने के लिए चारित्र को धारण करता है। जिसका आचरण किया जाता है, वह चारित्र है। पापों की नाली के समान हिंसा, असत्य, चोरी,…