सल्लेखना का स्वरूप
सल्लेखना का स्वरूप प्रतीकार रहित उपसर्ग आने पर, दुष्काल होने पर, बुढ़ापा अथवा रोग विशेष के आने पर, रत्नत्रय धर्म की आराधना करते हुए शरीर का त्याग करना सल्लेखना है। श्रावक के बारह व्रतों के अंत में सल्लेखना करने का विधान है। ‘‘मरण के समय में होने वाली सल्लेखना को प्रेमपूर्वक सेवन करना चाहिए।’’ वसुनन्दिश्रावकाचार…