पापाचरण!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पापाचरण – Papacarana. Sinful conduct. पापपूर्ण आचरण “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भद्रकलश – Bhadrakalasa. Name of the treasurer of Ram’. ८ वें बलदेव श्रीराम के कोषाध्यक्ष “
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मूलोत्तरप्रकृति–Mulottar Prakrati. Basic sub–karmic nature which are 148 in number. कर्मो की ज्ञानवरणादि 8मूलप्रकृति एवं इनके उत्तरभेद 148 मूलोत्तर प्रकृति कहलाती है”
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पानी छानना- Pani Chanana. Filtration of water with cloth. जलगालन . जैन विधि के अनुसार, जब कपड़े का मोटा छत्रा दोहरा करके उससे पानी छाना जाता है, तब वह जीवरहित शुद्ध जल होता है तथा छत्रे की जीवनी करने की भी विशेष विधि होती है”
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पद्मनंदि पंचविंषतिका : A book written by Acharya Padmanandi. आचार्य पदमनन्दि (ई0 11 का उत्तरार्ध) द्वारा संस्कृत छंदों में रचित गृहस्थ धर्म प्ररूपक एक ग्रन्थ । इस ग्रंथ के स्वाध्याय से गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी को गृहस्थवस्था में अल्पआयु।
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विद्युत्प्रभ – Vidyutprabha. One of the 4 Gajadant mountains, A city of vijayardh mountain. ४ गजदंत पर्वतों में एक गजदंत पर्वत, विजयार्ध पर्वत का एक नगर “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] बाह्य उपधि – Bahya Upadhi. Alien – belonging (material articles). बाह्य परिग्रह,आत्मा से एकत्व को नहीं प्राप्त हुए ऐसे क्षेत्र, वास्तु, धन आदि बाह्य उपधि हैं “
[[श्रेणी: शब्दकोष]] पदार्थ श्रद्धान: Real & right belief in all 9 mattars सम्यग्दर्शन हिंसादि रहित धर्म, अठारह दोष रहित आप्त, निग्र्रन्थ प्रवचन व गुरू में श्रद्धान रखना । 9 पदार्थो के यथार्थ श्रद्धान से सम्यग्दर्षन होता है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == गुणस्थान : == यैस्तु लक्ष्यन्ते, उदयादिषु सम्भवैर्भावै:। जीवास्ते गुणसंज्ञा निर्दिष्टा: सर्वर्दिशभि:।। मिथ्यात्वं सास्वादन: मिश्र:, अविरतसम्यक्त्व च देशविरतश्च। विरत: प्रमत्त: इतर: अपूर्व: अनिवृत्ति: सूक्ष्मश्च।। उपशान्त: क्षीणमोह: संयोगिकेवलिजिन: अयोगी च। चतुर्दश गुणस्थानानि च, क्रमेण सिद्ध: च ज्ञातव्या।। —समणसुत्त : ५४६-५४८ मोहनीय आदि कर्मों के उदय आदि (उपशम, क्षय, क्षयोपशम आदि)…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पात्रदत्ति:To offer food to Jaina with reverential and prescribed procedure.महातपस्वी मुनियो, आर्यिकाओ आदि सुपात्रो के लिए सत्कार पूर्वक पड़गाहन कर जो आहार आदि दिया जाता है उसे पात्रदति कहते है। इससे स्वर्ग एवं भोगभूमि आदि के सुख मिलते है।