वीतराग स्तोत्र!
[[श्रेणी : शब्दकोष]] वीतराग स्तोत्र –VitaragaStotra. Name of a Sanskrit spiritual hymn. एक आध्यात्मिक संस्क्रत स्तोत्र ” शिवं शुध्द बुध्दं …………. चिदानंद रूपं णमो वितरागं “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] वीतराग स्तोत्र –VitaragaStotra. Name of a Sanskrit spiritual hymn. एक आध्यात्मिक संस्क्रत स्तोत्र ” शिवं शुध्द बुध्दं …………. चिदानंद रूपं णमो वितरागं “
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वेदयबंधी प्रकृति – Svodayabamdhii Prakrti. Karmic natures causing binding with self rising. स्वयं के उदय के साथ बंधने वाली प्रकृतियाॅ। ज्ञानावरणी की 5, अंतराय की 5, दर्शनावरणी की चक्षुदर्शनावरणादि 4, तैजस शरीर, कार्मण शरीर, निर्माण, स्थिरयुगल, शुभयुगल तथा वर्णचतुष्क, अगुरुलधु और मिथ्यात्व इन 27 प्रकृतियो का स्वोदय से बंध होता है।
[[श्रेणी : शब्दकोष]] व्यंतरदेव –Vyaintaradeva. Peripatetic deities ( Bhoot, Pishach etc.). किन्नर, किम्पुरुष, महोरग, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, भुत और पिशाच ये ८ प्रकार के व्यंतर देव कहलाते हैं ” ये वैकिर्यिक शरीर के धारी होते हैं एवं इनके असंख्य भवनों में जिनमंदिर होते हैं “
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वाभाविक विमान – Svaabhaavika Vimaana. Natural aboding places of heavenly deities. विमान के दो भेदो मे एक भेद-एक विक्रिया से उत्पन्न हुए और दूसरे स्वभाव से । विक्रिया से उत्पन्न हुए विमान विनश्वर होते है व स्वभाव से उत्पन्न हुए विमान रम्य, नित्य व अविनश्वर होते है।
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वस्थान-स्वस्थान-अवस्थान – Svasthaana-Svasthaana-Avasthaana. Activity done by one in own birth place. अपने उत्पन्न होने के ग्राम, नगर अथवा अरण्य मे सोना, बैठ़ना, चलना आदि व्यापार से युक्त रहने का नाम स्वस्थान-स्वस्थान-अवस्थान है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सांद्र – Saandra. Regular solid, Smooth, Beautiful. नियमित सान्द्र, धन, ठोस, चिकना, मृदु, सुन्दर।
[[श्रेणी : शब्दकोष]] मनोहर- Manohara. Beautiful, alluring, pleasing, A type of peripatetic deities, Name of initiation – forests of Lord Padmaprabh, Shreyansnath and Vasupujya. मनकोमोहितकरनेवाला , महोरगजातिकाएकव्यंतरदेव , एकवनजहाँतीर्थंकरपदमप्रभ, श्रेयांसनाथ , वासुपूज्यनेदीक्षालीथी “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[श्रेणी:शब्दकोष ]] == केवलज्ञान : == तह य अलोयं सव्वं तं णाणं सव्व—पच्चक्खं।। —कार्तिकेयानुप्रेक्षा : २५४ जो द्रव्य—पर्याय से युक्त संपूर्ण लोक को और संपूर्ण अलोक को (सब कुछ को) प्रकाशित एवं प्रत्यक्ष करता है, वह केवलज्ञान हुआ करता है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रतिष्ठातिलक- नेमिचन्द्र विरचित प्रश्ठिा की सम्पूर्ण विधी से समन्वित एक प्रतिष्ठा ग्रंथ। pratishthatilaka – a worshipping treatise written by shri nemi-chandra (related to consecratory installation of lord idols).