बालिश्त!
[[श्रेणी : शब्दकोष]] बालिश्त – Balista. An area unit क्षेत्र का प्रमाण विशेष ” अपरनाम वितस्ति “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] बालिश्त – Balista. An area unit क्षेत्र का प्रमाण विशेष ” अपरनाम वितस्ति “
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वसमय प्रवृत्ति – Svasamaya Pravrtti. Engrossment into self. स्वरुप मे चरण करना चारित्र है, स्वसमय मे प्रवृत्ति करना इसका अर्थ है। देखे-स्वसमय।
[[श्रेणी : शब्दकोष]] वृत्त विष्कंभ –VrttaViskambha Diameter, width of a ring. वृत्त का व्यास “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == जिनवाणी : == जिनवचनमौषधमिदं, विषयसुखविरेचनम् अमृतभूतम्। जरामरणव्याधिहरणं, क्षयकरणं सर्वदु:खानाम्।। —समणसुत्त : १८ जिनवाणी वह अमृत समान औषधि है, जो विषय—सुखों का विरेचन करती है, जरा व मरण की व्याधि को दूर करती है और सभी दु:खों का क्षय करती है। लब्धमलब्धपूव, जिनवचन—सुभाषितं अमृतभूतम्। गृहीत: सुगतिमार्गो, नाहं मरणाद् बिभेमि।।…
[[श्रेणी: शब्दकोष]] स्वर्णनाभ – Svarnanaabha. Name of the 17th city in the south of Vijayardha mountain, name of a king of Arishtapur. विजयार्ध की दक्षिण श्रेणी का 17वां नगर, अस्ष्टिपुर नगर का राजा। कृष्ण की रानी पद्यावती का पिता।
[[श्रेणी: शब्दकोष]] पदगतभंग : Differentiation of different feelings on different aspects according toer knowledge. Perception etc. क्षायोपशमिक आदि 5 भावों के ही भिन्न भिन्न ज्ञान दर्शनादि भाव केा ग्रहण कर भग करना ।
[[श्रेणी : शब्दकोष]] वैस्रसिक परिणाम –Vaisrasika Parinama. Natural changes. स्वाभविक परिवर्तन, जिसमें पुरुष प्रयत्न की आवश्यकता नहीं होती “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संध्या – Sandhyaa. Evening, Joining period of night-morning, morning-afternoon & evening-night (i.e. dawn, mid-joining & dusk). शाम ” प्रातः,मध्यान्ह,सायंकाल के संधिकालों को संध्या कहते हैं ” इन संधिकालों में वंदना एवं सामायिक की जाती है “
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वरुप (देव) – Svaruupa (Deva). A type of peripatetic deities of Yaksh type, Name of an Indra of some peripatetic deities of Bhoot types. यक्ष जाति के व्यंतर देवो के 12 भेदो मे 10वां भेद, भूत जातिक के व्यंतर देवो का इन्द्र।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पण्य भवन :Palace of Somdev situated in the east of Nandon etc. forests of Sumeru (mountain). सुमेरू पर्वत के नन्दनादि वनों के पूर्व में स्थित सोमदेव का भवन।