वरचंद्र!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] वरचंद्र – Varachandra: Name of the 6th predestined Balbhadra,Name of the son of Lord Chandraprabh in His worldly life. आगामी छठा बलभद्र ,तीर्थंकर चन्द्रप्रभ का एक पुत्र .इसे राज्य सौंपकर ही वह दीक्षित हुए थे “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] वरचंद्र – Varachandra: Name of the 6th predestined Balbhadra,Name of the son of Lord Chandraprabh in His worldly life. आगामी छठा बलभद्र ,तीर्थंकर चन्द्रप्रभ का एक पुत्र .इसे राज्य सौंपकर ही वह दीक्षित हुए थे “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] न्याय – Nyaaya. Verdict or jisticce. क़ानून, इंसाफ, सच्चाई, निर्णय या जिसके द्वारा निश्चय किया जाये ऐसी नितिक्रिया का करना न्याय कहा जाता है”
[[श्रेणी: शब्दकोष]] परंपरा मुक्ति Salvation after one or two births.एक दो आदि भवों के अनंतर मुक्ति होना ।
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विभ्य – Vibhya. An infraction of paying reverence (reverence due to influence of Acharya etc.). वंदना का एक अतिचार, आचार्य आदि के भय से वंदना करना “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] वैक्रियिक शरीर अंगोपांग –VaikriyikaSariraAmgopaniga. A Karmic nature causing formation of the organs of transformable body of deities & hellish beings. नामकर्म का एक भेद, जिसके उदय से देव – नारकी के शरीर के अंग व उपअंग बनते हैं “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] नौ – Nau. Nine, a number. नव-जैसे, नव अनुदिशा, नव ग्रैवेयक, नव नारायण, नव निधि इत्यादि “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == मोक्ष—मार्ग : == दर्शनज्ञानचारित्राणि, मोक्षमार्ग इति सेवितव्यानि। साधुभिरिदं भणितं, तैस्तु बन्धो वा मोक्षो वा।। —समणसुत्त : १९३ जिनेन्द्र देव ने कहा है कि (सम्यक्) दर्शन, ज्ञान, चारित्र मोक्ष का मार्ग है। साधुओं को इनका आचरण करना चाहिए। यदि वे स्वाश्रित होते हैं तो इनसे मोक्ष होता है और…
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विभाषा – Vibhasha. Describing of something in different ways (like by presentation, exposition, description etc.). विविध प्रकार के भाषण अर्थात् कथन करने को विभाषा कहते हैं ” विभाषा, प्ररूपणा, निरूपण, व्याख्यान ये सब एकार्थवाची नाम हैं “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भद्र प्रक्रति – Bhadra Prakrti. Gentle disposition. भला या सज्जन स्वभाव होना ” सरल स्वभावी “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == नश्वरता : == जम्मं मरणेण समं, संपज्जइ जुव्वणं जरासहियं। लच्छी विणससहिया, इय सव्वं भंगुरं मुणह।। —कार्तिकेयानुप्रेक्षा : ५ जन्म के साथ मरण, यौवन के साथ बुढ़ापा, लक्ष्मी के साथ विनाश निरंतर लगा हुआ है। इस प्रकार प्रत्येक वस्तु को नश्वर समझना चाहिए