विपरिणामना!
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विपरिणामना – Viparinamana. Change or modification in state. सत् के द्वारा अवस्थान्तर की प्राप्ति होना ” यह प्रक्रति विपरिणामना, स्थितिविपरिणामना, अनुभाग- विपरिणामना, प्रदेशविपरिणामना ४ प्रकार की होती है “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विपरिणामना – Viparinamana. Change or modification in state. सत् के द्वारा अवस्थान्तर की प्राप्ति होना ” यह प्रक्रति विपरिणामना, स्थितिविपरिणामना, अनुभाग- विपरिणामना, प्रदेशविपरिणामना ४ प्रकार की होती है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संप्रति – Sanprati. Present time, Another name of king Chandragupt-II. वर्तमान, मगधराज अशोक का पौत्र, अपरनाम चन्द्रगुप्त द्वितीय ” समय – ई.पू. 220-211 “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == सुख : == जं च कामसुहं लोए जं च दिव्वं महासुहं। वीतरागसुहस्सेदे णंतभागं पि णग्घई।। —मूलाचार : १४४ लोक में काम—भोगों से मिलने वाला सुख और देवों को मिलने वाला महासुख उस सुख का अनंतवाँ हिस्सा भी नहीं, जो वीतराग को प्राप्त हुआ करता है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] शोक (कर्मप्रकृति) – Shoka(Karmaprakriti). Karmic nature causing griefor sorrow. नोकषाय के 9 भेड़ों में एक भेद; जिसके उदय से शोक भाव होता है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रव्रज्या- सप्त परम स्थान में से एक; सम्पूर्ण परिग्रह त्याग कर Þजिनदीक्षाß ग्रहण करना। Pravrajya- Renunciation of worldly affair for Jaina initiation
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भद्रबाहुचरित – Bhadrabahucarita. A book written by Acharya Ratnakirti. आचार्य रत्नकीर्ति (ई. १५१५) द्वारा रचित एक ग्रंथ “
चंवर An auspicious article which is to be kept near Tirthankars’ (Jaina-Lords’) idol. प्रतिमा के पास में विद्यमान रहने वाले अष्ट मंगल द्रव्यों में एक ।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रत्याख्यानावरण कर्मप्रकृति- pratyakhyanavarana karma prakrti Karmic nature obscuring positive relation चारित्र मोहनीय कर्म का एक भेद। संयम को रोकने वाली कशाय, जिसके उदय से संयम नामवाली परिपूर्ण विरति को यह जीव करने में समर्भ नही होता है।
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मुखधन – Mukhdhan. Something principal. आदि स्थान में जो प्रमाण या संख्या है वह मुखधन कहलाती है”
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रत्यक्षज्ञान- pratyaksajnana Direction knowledge gained by the soul itself without any external help. इनिद्रय और मन की सहायता के बिना जो ज्ञान पदार्थ को स्पश्ट जाने, इसके दो भेदहैं- देष प्रत्यक्ष (अवधि एवं मन:पर्ययज्ञान) एवं सकल प्रत्यक्ष (केवलज्ञान)