यश:कीर्ति!
[[श्रेणी :शब्दकोष]] यश:कीर्ति–Yashahkirti. Name of many Acharyas & Bhattarakas. नंदिसंघ, काष्ठासंघ में इस नाम के कई आचार्य एवं भट्टारक हुए है”
[[श्रेणी :शब्दकोष]] यश:कीर्ति–Yashahkirti. Name of many Acharyas & Bhattarakas. नंदिसंघ, काष्ठासंघ में इस नाम के कई आचार्य एवं भट्टारक हुए है”
[[श्रेणी:शब्दकोष]] नीतिसार – Neetisaara. A book written by Aacharya Indranandi. आचार्य ईन्द्रनंदी (ई. श. 10) की नीति विषयक रचना “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == लोभी : == सुवर्णरूप्यस्स च पर्वता भवेयु:, स्यात् खलु कैलाससमा असंख्यका:। नरस्य लुब्धस्य न तै: किंचित्, इच्छा खलु आकाशसमा अनन्तिका।। —समणसुत्त : ९८ कदाचित् सोने और चाँदी के कैलास के समान असंख्य पर्वत हो जाएं, तो भी लोभी पुरुष को उनसे तृप्ति नहीं होती, क्योंकि इच्छा आकाश के…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] शिवगुप्त – Shivagupta. Name of the initiator (an acharya) of Chakravarti (emperor) Sanatkumar, Name of the disciple of Gupti-riddhi saint of Punnat group. चक्रवर्ती सनत्कुमार के दीक्षागुरु ” पुन्नाट संघी गुप्तिऋद्धि के शिष्य तथा अर्हदवलि के गुरु, समय- ई.स. 33 “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] निस्तारण मंत्र – Nistaarana Mantra. A pain relieving Mantra (mystic words). कष्ट निवारण मंत्र, गर्भान्वय क्रियाओं में इन मंत्रों से होम होता है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] लता – 84 लाख लतांग प्रमाण काल धातिया कर्म की अनुभाग षक्ति का एक उदाहरण। Lata- A large unit of time
[[श्रेणी:शब्दकोष]] निसर्ग क्रिया – Nisarga Kriyaa. Encouraging for the sinful or wrong activities, Abetting. आस्रव को बढ़ाने वाली श्रावक की 25 क्रियाओं में सत्रहवीं क्रिया; जो प्रवृत्ति पाप का कारण है उसमें सम्मति देना “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] ब्रह्माद्वैत – Brahmadvaita. Name of a doctrine (related to monotheism). एक अद्वैतवाद मत ” ब्रम्ह को ही पारमार्थिक सत् मानने वाला “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] वचन (अनालोच्य) – Vachan (Anaalochya). False interpretation of something. असत्य वचन के 4 भेदों में एक भेद ; विपरीत सत् पदार्थ का प्रतिपादन करना ” जैसे – बैल है उसका विचार न कर यहाँ घोडा है ऐसा कहना “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] निष्क्रियत्व शक्ति – Nishkriyatva shakti. Supreme power of inactivity (of Siddhas). समस्त कर्मों के अभाव से प्रवृत्त आत्मप्रदेशों की निस्पन्द्ता स्वरूप निष्क्रियत्व शक्ति है, जो कि सिद्ध अवस्था में प्रगट होती है “