मोक्षशास्त्र!
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मोक्षशास्त्र–Mokshshastr. Name of a treatise written by Acharya Umasvami. आचार्य उमास्वामी (ई.स. 179–243) कृत एक ग्रंथ का नाम” यह जैनधर्म का सारभूत ग्रंथ है और इस पर अनेक आचार्यो द्वारा अनेक टीकाएं लिखी गई”
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मोक्षशास्त्र–Mokshshastr. Name of a treatise written by Acharya Umasvami. आचार्य उमास्वामी (ई.स. 179–243) कृत एक ग्रंथ का नाम” यह जैनधर्म का सारभूत ग्रंथ है और इस पर अनेक आचार्यो द्वारा अनेक टीकाएं लिखी गई”
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भव्य – Bhavya. Splendid, Magnificent, one who is supposed to get salvation. जिसमें सम्यग्दर्शन आदि भाव प्रकट होने की योग्यता है वह जीव “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सूर – Soora. A great warrior, Name of a country of Bharat Kshetra Arya Khand (region), Name of a kind of Hari dynasty. शौर्य गूण से सहित अर्थात् समर्थ को सूर कहते है, भरत क्षेत्र के आर्य खण्ड का एक देश, हरिवंशी एक राजा, जिनकी रानी सुरसुन्दरी थी तथा इनके पुत्र राजा अन्धकवृष्टि थे…
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विविक्त शय्यासन – Vivikta Sayyasana. Isolated place for sleeping or rest. पांचवां बाहा तप-व्रत की शुध्दि के लिए, पशु, स्त्री आदि से रहित एकांत प्रासुक स्थान में साधु के द्वारा ध्यान – अध्ययन के लिए शय्या व आसन ग्रहण करना “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] वेना – Venaa. Name of a river of Bharat KshetraAryakhand (region) भरतक्षेत्र के आर्यखंड की एक नदी “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भविष्यत् ज्ञायक शरीर – Bhavisyat Gnayaka Sarira. A predestined prophet, one having the knowl-edge of future events. जो तत्वज्ञान को जानने वाला आगे होगा वह भविष्यत् ज्ञायक शरीर है “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विमुख – Vimukha. Indifferent knowledge, contrary to known sub-jects. ज्ञेय विषयों से विभिन्न रूप वाले ज्ञान को विमुखज्ञान कहते हैं “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सूक्ष्मसाम्पराय शुद्धि संयत – Sukshmasaamparaaya Suddhi Samnyata. One with minute passions (towards purity). मोहकर्म का उपशमन या क्षपण करने वाले जिस साधु के मात्र संज्वलन लोभ रूप सूक्ष्म कषाय शेष रह जाती है वह सूक्ष्म सांपराय संयत कहलाता है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == स्कन्ध : == द्विप्रदेशादय स्कन्धा: सूक्ष्मा वा बादरा: संस्थाना:। पृथिवीजलतेजोवायव:, स्वकपरिणामैर्जायन्ते।। —समणसुत्त : ६५३ द्विप्रदेशी आदि सारे सूक्ष्म और बादर (स्थूल) स्कनध अपने परिणमन के द्वारा पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु के रूप में अनेक आकार वाले बन जाते हैं। अवगाढगाढनिचित: पुद्गलकायै: सर्वतो लोक:। सूक्ष्मैबार्दरैश्चाप्रायोग्यै:।। —समणसुत्त : ६५४ यह…