उत्पत्ति!
उत्पत्ति Origination, Birth. जीवों की उत्पत्ति अर्थात् जन्म लेना।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
उत्पत्ति Origination, Birth. जीवों की उत्पत्ति अर्थात् जन्म लेना।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी: शब्दकोष]] परपरिवाद कथा:Condemnatory talk.25 विकथाओं में एक कथा दूसरे की निंदा आदि करना ।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] रक्तोदा नदी – 14 महानदियो में चैहदवी महानदी, यह षिखरी पर्वत के पुण्डरिक द्रह से निकलकर पष्चिम की ओर ऐरावत क्षेत्र में बहती है। Raktoda nadi-Name of a great river which flows in Eravat region
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वाहा – Svaahaa. An exclamation used in the worshipping of God. पूजा, मंत्र, हवन आदि मे प्रयुक्त होने वाला शांतिवाचक एक विषेष शब्द।
[[श्रेणी: शब्दकोष]] परघात नामकर्म प्रकृति:A Karmc nature whicdh causes formation of destructive means like poision etc. in the body. पर जीवों के घात को परघात कहते है। जिस कर्म के उदय से शरीर में पर को घात करने के कारणभूत पुदगल निष्पन्न होते हैं, वह परघात नामकर्म प्रकृति है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] रक्षाबंधन पर्व – श्रावण षु 15 के दिन आने वाला एक पर्व।इस दिन बहने अपने भाईयो को रक्षासूत्र बांधती है।जैनधर्म के अनुसार यह पर्व हस्तिनापुर से प्रारम्भ हुआ, जहा आज से 14 लाख वर्श पूर्व अंकपनाचार्य आदि 700 मुनियो पर किये गए उपसर्ग को विश्णुकुमार मुनिराज ने दूर कर उनकी रक्षा की थी। उसी…
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वानुभूति – Svaanubhuuti. Self realization or intuition. आत्मानुभूति। आत्मा का अनुभव या ज्ञान जो सम्यक्त्व स्वरुप है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संस्थान नामकर्म प्रकृति – Sansthaana Naamakarma Prakrti. Physique making Karma causing figure of the body. जिस कर्म के उदय से 6 प्रकार के संस्थानों में से कोई एक रूप शरीर का आकार हो “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] साकार स्थापना – Saakaara Sthaapanaa. If the representative and the represented are similar in fiqure, then such installation are called Sakar Sthapana. तदाकार स्थापना निक्षेप, पाषाण या धातु की बनी हुई तदाकार प्रतिबिम्ब मे जिनेन्द्र भगवान की या इन्द्र की स्थापना करना तदाकार स्थापना है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सचित्त पूजा – Sachitta Poojaa. A type of worshipping of Lord Jinendra (in Samavasaran), Acharya (saints) etc. द्रव्यपूजा के 3 भेदों में एक भेद; प्रत्यक्ष उपस्थित जिनेन्द्र भगवान (समवशरण में) और गुरु आदि का यथायोग्य पूजन करना सचित्त पूजा है “