08. कायमार्गणा
कायमार्गणा (अष्टम अधिकार) काय का स्वरूप जाईअविणाभावी, तसथावरउदयजो हवे काओ। सो जिणमदम्हि भणिओ, पुढवीकायादिछब्भेयो।।५९।। जात्यविनाभावित्रसस्थावरोदयजो भवेत् काय:। स जिनमते भणित: पृथ्वीकायादिषड्भेद:।।५९।। अर्थ—जाति नाम कर्म के अविनाभावी त्रस और स्थावर नामकर्म के उदय से होने वाली आत्मा की पर्याय को जिनमत में काय कहते हैं। इसके छह भेद हैं—पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति और त्रस। भावार्थ…