26. व्यवहार रत्नत्रय उपादेय है या नहीं?
व्यवहार रत्नत्रय उपादेय है या नहीं? णियमेण य जं कज्जं तं णियमं णाणदंसणचरित्तं। विवरीयपरिहरत्थं भणिदं खलु सारमिदि वयणं।।३।। जो करने योग्य है नियम से वो ही ‘नियम’ है। वो ज्ञान दर्शन औ चरित्ररूप धरम है।। विपरीत के परिहार हेतु ‘सार’ शब्द है। अतएव नियम से ये ‘नियमसार’ सार्थ है।।३।। अर्थ-नियम से जो करने योग्य है…