दिगम्बर-परम्परा में ‘संवत्सरी’ शब्द (पारस प्रिंटर्स एण्ड पब्लिशर्स, नौएडा (उ.प्र.) की ओर से श्री नवीन जैन की ओर से प्रकाशित पत्र ‘रत्नराज’ के मई १९९५ के अंक में पृष्ठ १३ से पृष्ठ १६ तक श्वेताम्बर जैन तेरापंथ के प्रथम गणाधिपति श्री तुलसी जी का ‘संवत्सरी’ शीर्षक से लेख प्रकाशित हुआ है। इसमें विद्वान लेखक ने…
ज्ञानामृत (भाग – २) प्रश्नोत्तरी प्रश्न १ :-सर्वावधि ज्ञान किनको होता है ?(१) निश्चल ध्यान में स्थित मुनि के (२) भावलिंगी व वृद्धिंगत चारित्र वाले मुनि के(३) ऋद्धिधारी मुनियों के (४) इनमें से किसी के नहीं होता हैउत्तर:-भावलिंगी व वृद्धिंगत चारित्र वाले मुनि के प्रश्न २ :-जम्बूद्वीप में वृषभाचल पर्वत कितने हैं ? (१) ३२…
क्षमा बड़न को चाहिए हर प्राणी मानसिक सुख शांति पूरे मन से चाहता है। व्यक्ति कितना ही पैसा कमा ले, इससे सुख शांति नहीं मिल जाती। यही वजह उसे और अधिक परेशान करती है। झूठी जी हजूरी या चापलूसी के दम पर मिली शांति क्षणिक होगी। जब तक आपके पास पैसा या उच्च पद हो…
घर में पूजा का स्थान कहाँ होना चाहिए अनादिकाल में जब सृष्टि की रचना हुई थी सृष्टि के रचयिता ने विश्वकल्याण के लिए जीव एवं प्रकृति का सृजन किया। जीव एवं प्रकृति दोनों ही प्रगतिशील हैं। प्रकृति एवं जीव अपनी पृथकता का अनुभव करते हैं मगर क्रियाएँ प्रकृति एवं जीव के शरीर से अपने आप…
जीव समास संसार के भीतर रहने वाली अनन्त जीव जातियों के संग्रह करने की उस पद्धति को जीव समास कहते हैं जिसमें कोई जीव जाति छूट न जावे। त्रस—स्थावर, बादर—सूक्ष्म, पर्याप्त—अपर्याप्त और प्रत्येक—साधारण ये चार युगल हैं। इनमें पारस्परिक विरोध से रहित त्रसादि कर्मों से युक्त जाति नाम का उदय होने पर जीवों में ऊध्र्वता…
कैसे करें व्यक्तित्व का विकास ज्ञान का प्रवेशद्वार: स्वाध्याय लेखक— राष्ट्रसंत श्री गणेशमुनि शास्त्री स्वाध्याय , सत्संग, पुस्तकों का चयन, लेखन कला, वत्तृत्व कला आदि सभी ज्ञानोपलब्धि की भिन्न—भिन्न पगडंडियाँ हैं। ये सभी एक ही मंजिल पर पहुँचती हैं, जहाँ हमारे व्यक्तित्व का बहुमुखी सर्वंगीण विकास छिपा है। अत: इन सब पर विस्तार से चर्चा…
जैन कर्मसिद्धान्त और मनोविज्ञान डा. रत्नलाल जैन, बी पब्लिशर्स (प्रा.) लि. १९२१/१०, चूना मण्डी, पहाड़गंज, नई दिल्ली— ११००५५, १९९६, पृ. २८२, मू. २५५/ भारतीय दर्शन जीवनदर्शन है। इसमें भी जैन चिन्तनधारा का अनुपम स्थान है। इसमें आत्मा, परमात्मा, लोक और कर्म आदि दार्शनिक तत्वों पर गंभीर अध्ययन और सूक्ष्म विवेचन किया गया है। जैन कर्मसिद्धान्त…
जिनवाणी की महिमा (कानजी पंथ की धारणा है कि मोक्ष प्राप्ति के लिए कुन्दकुन्द स्वामी का समयसार ही सदा अभ्यसनीय, पठनीय एवं मननीय ग्रन्थरत्न है। अन्य शास्त्र अनुपयोगी हैं। इस निबन्ध में कुन्दकुद स्वामी की वाणी दी गईं, जो सम्पूर्ण जिनवाणी के प्रथमानुपयोग, करणानुयोग, चरणानुपयोग, द्रव्यानुयोग रूप अंगों का अभ्यास आवश्यक बताती हैं। वे महर्षि…
ज्ञानामृत (भाग – ३) प्रश्नोत्तरी प्रश्न १ :- बारह अंगों एवं चौदह पूर्व से समन्वित जिनवाणी माता के पैरों को क्या बताया है ?(१) उपासकाध्ययनांग (२) सूत्रकृतांग(३) विपाकसूत्र अंग (४) व्याख्याप्रज्ञप्तिउत्तर:- विपाकसूत्र अंग प्रश्न २:- राजा श्रीषेण का जीव भोगभूमि से चयकर सौधर्म स्वर्ग के श्रीप्रभ विमान में…………नाम का देव हुआ।(१) श्रीकांत (२) श्रीप्रभ(३) श्रीधर(४)…