क्षमावाणी मात्र से नहीं, प्राणी मात्र से!
क्षमावाणी मात्र से नहीं, प्राणी मात्र से संसार में जन्म—मरण करते हुए परिभ्रमण करने वाले सभी जीव वैभाविक भावों से युक्त हैं। उनके ये भववर्धक संस्कार कर्मों के उदयाधीन है। यह संसारी जीव राग—द्बेष की कीचड़ से सना हुआ अपनी आत्मा को शुभाशुभ कर्मों से मलिन कर रहा है। उसको मित्यात्व उसे संसारी खूंटे से…