क्या राजा सोमप्रभ एवं श्रेयांस श्री कामदेव बाहुबली के पुत्र थे ? जरा विचार करें युग की आदि में भगवान ऋषभदेव ने अयोध्या नगरी में जन्म लिया था। माता मरुदेवी एवं पिता नाभिराज ने यौवन अवस्था में भगवान ऋषभदेव का विवाह यशस्वती और सुनन्दा नामक दो कन्याओं के साथ सम्पन्न किया, जिसमें से महारानी यशस्वती…
भावनिर्जरा-द्रव्यनिर्जरा जिन परिणामों से यथाकाल, फल देकर पुद्गल कर्म झड़े। और जिन भावों से तप द्वारा, फल दें अकाल में कर्म झड़ें।। बस भावनिर्जरा कहलाता, है भाव वही ऐसा जानो। है द्रव्यनिर्जरा कर्मों का, झड़ना यह बात सही मानो।।३६।। यथासमय-उदय काल में फल देकर अथवा तप के द्वारा आत्मा के जिन भावों से कर्म झड़…
सुधर्म बलभद्र एवं स्वयंभू नारायण भगवान विमलनाथ के तीर्थ में सुधर्म बलभद्र एवं स्वयंभू नारायण हुए हैं। उन्हीं का संक्षिप्त चरित कहा जा रहा है-जम्बूद्वीप के पश्चिमविदेह में मित्रनंदी राजा धर्मन्यायपूर्वक प्रजा का पालन कर रहे थे। किसी समय सुव्रतजिनेन्द्र के पादमूल में धर्मोपदेश सुनकर भोगों से विरक्त हुए जैनेश्वरी दीक्षा ले ली और आयु…
जयसेन चक्रवर्ती भगवान नमिनाथ के तीर्थ में जयसेन नाम के ग्यारहवें चक्रवर्ती हुए हैं। इसी जम्बूद्वीप के उत्तर में ऐरावत क्षेत्र में श्रीपुर नगर के राजा ‘वसुंधर’ राज्य संचालन कर रहे थे। किसी समय रानी पद्मावती के मरण से दु:खी हुए मनोहर नाम के वन में वरचर्य (वरधर्म) नाम के केवली भगवान की गंधकुटी में…
पद्म चक्रवर्ती उज्जयिनी नगरी में श्रीधर्मा नाम के प्रसिद्ध राजा थे, उनकी श्रीमती नाम की रानी थी। राजा के बलि, बृहस्पति, नमुचि और प्रह्लाद ऐसे चार मंत्री थे । किसी समय सात सौ मुनियों सहित महामुनि अकंपनाचार्य उज्जयिनी के बाहर उपवन में विराजमान हुए । महामुनि की वंदना के लिए नगर के लोग उमड़ पड़े।…
जुआ खेलने से हानि रुपया-पैसा-कौड़ी वगैरह से हार-जीत की शर्त लगाकर ताश आदि खेलना जुआ खेलना कहलाता है अत: जुआ खेलना सब अनर्थों की खान है। इसी पर एक कथा है-हस्तिनापुर के राजा धृतराज के धृतराष्ट्र, पाण्डु, विदुर, ये ३ पुत्र थे। धृतराष्ट्र के दुर्योधन आदि १०० पुत्र हुए और पांडु के कुन्ती रानी से…
पुरुषार्थसिद्धि का स्वरूप और उपाय : एक चिन्तन आचार्य अमृतचन्द्र—जैन वाङ्मय में प्रखर भास्वर के समान दसवीं शताब्दी के ऐसे महान आचार्य हैं, जिनका नाम आ. कुन्दकुन्ददेव, उमास्वामी और समन्तभद्र के पश्चात् बड़े आदर के साथ लिया जाता है। ‘‘पुरुषार्थसिद्धयुपाय’’ इनकी मौलिक रचना है, जिसे श्रावकों की ‘‘आचार—संहिता’’ कह सकते हैं। इस ग्रंथ में पुरुष…
मानवीय मूल्यों की संवाहिका: गणिनी ज्ञानमती समता जैन सारांश गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी सम्प्रति सर्वाधिक वरिष्ठ दीक्षित गणिनी आर्यिका हैं। उन्हें डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद एवं तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद द्वारा डी. लिट् की मानद उपाधियों से सम्मानित किया जा चुका है। लगभग ३०० ग्रंथों का सृजन कर उन्होंने साहित्य सृजन…
लब्धि स्वरूप एवं विश्लेषण आत्मा का स्वभाव ज्ञान दर्शन स्वरूप है। इस गुण को आठों कर्मों ने आच्छादित कर दिया है। आत्मा में ज्ञान आदि शक्ति विशेष लब्धि है। लब्धि शब्द का व्युत्पत्तिलक्ष्य अर्थ है— ‘‘लम्भनं लब्धि :—प्राप्त होना। ज्ञानावरण कर्म क्षयोपशमविशेष:’’ (स. सि. २//१८, २९६ पृष्ठ १२७) अर्थात् ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम विशेष को…