उन्मत्त :!
[[श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == उन्मत्त : == होदि कसाउम्मत्तो उम्मत्तो, तह ण पित्तउम्मत्तो —भगवती आराधना : १३२५ वात, पित्त आदि विकारों से मनुष्य वैसा उन्मत्त नहीं होता, जैसा कि कषायोंन्मत्त ही वस्तुत: उन्मत्त है।
[[श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == उन्मत्त : == होदि कसाउम्मत्तो उम्मत्तो, तह ण पित्तउम्मत्तो —भगवती आराधना : १३२५ वात, पित्त आदि विकारों से मनुष्य वैसा उन्मत्त नहीं होता, जैसा कि कषायोंन्मत्त ही वस्तुत: उन्मत्त है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == आहार-विवेक : == रसा: प्रकामं न निषेवितव्या:, प्रायो रसा दीप्तिकरा नराणाम्। दीप्तं च कामा: समभिद्रवन्ति, द्रुमं यथा स्वादुफलमिव पक्षिण:।। —समणसुत्त : २९३ रसों का अत्यधिक सेवन नहीं करना चाहिए। रस प्राय: उन्मादवर्धक होते हैं, पुष्टिवर्धक होते हैं। मदाविष्ट या विषयासक्त मनुष्य को काम वैसे ही सताता या उत्पीड़ित करता है जैसे…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == आत्मानुभव : == आतम अनुभव पूâल की, नवली कोऊ रीति। नाक न पकरै वासना, कान गहै न परतीति।। —आनंदघन ग्रंथावली, पद :: २८ आत्मानुभव रूपी पुष्प की विलक्षणता ही कुछ निराली है। इसकी सुगंध को न नाक ग्रहण कर पाती है और न कान इसका संगीत सुन सकते हैं। आतम अनुभौ…
[[श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == कर्तव्य : == मा होह कोवणा भो खलेसु मित्त च मा कुणह।। —कुवलयमाला : ८५ हे मानव ! जीवों को मत मारो, उन पर दया करो, सज्जनों को अपमानित मत करो, क्रोधी मत होओ और दुष्टों से मित्रता न करो। धम्मम्मि कुणह वसणं राओ सत्थेसु णिउणभणिएसु। पुणरुत्तं च कलासु ता गणणिज्जो सुयणमज्झे।।…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == कर्म : == जीवाणं चेयकडा कम्मा कज्जंति, नो अचेयकडा कम्मा कज्जंति। —भगवती सूत्र : १६-२ आत्माओं के कर्म चेतनाकृत होते हैं, अचेतनाकृत नहीं। कर्म चिन्वन्ति स्ववशा:, तस्योदये तु परवशा भवन्ति। वृक्षमारोहति स्ववश:, विगलति स परवश: तत:।। —समणसुत्त : ६० जीव कर्मों का बंध करने में स्वतंत्र है पर उस कर्म का…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार]] == आलोचना : == अनाभोगकृतं कर्म, यत्किमपि मनसा कृतम्। तत्सर्वमालोचयेत् खलु, अव्याक्षिप्तेन चेतसा।। —समणसुत्त : ४६१ मन—वचन—काय द्वारा किए जाने वाले शुभाशुभ कर्म दो प्रकार के होते हैं—आभोगकृत और अनाभोगकृत। दूसरों द्वारा जाने गए कर्म आभोगकृत हैं और दूसरों के द्वारा न जाने गए कर्म अनाभोगकृत हैं। दोनों प्रकार के कर्मों की तथा…
[[श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == आत्म—प्रशंसा : == अप्पसंसं परिहरह सदा मा होह जसविणासयरा। अप्पाणं थोवंतो तणलहुदो होदि हु जाणम्मि।। —भगवती आराधना : ३५९ आत्म—प्रशंसा का सदा के लिए त्याग कर देना चाहिए। कारण यह कि आत्म प्रशंसा यश को नष्ट करने वाली है। स्वयं अपनी प्रशंसा करने वाला संसार में तिनके की तरह तुच्छ हुआ करता…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == कर्म-निर्जरा : == जं अण्णाणी कम्मं, खवेदि भवसयहस्स—कोडीहिं। तं णाणी तिहिं गुत्तो, खवेदि उस्सासमेत्तेण।। —प्रवचनसार : ३-३८ अज्ञानी साधक बाल तप के द्वारा लाखों—करोड़ों जन्मों में जितने कर्म खपाता है, उतने कर्म मन, वचन, काया को संयत रखने वाला ज्ञानी साधक एक श्वास मात्र में खपा देता है। भवकोडी—संचियं कम्मं, तवसा…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == आवागमन : == राग दोस मोह के पासे, आप वणाए हितधर। जैसा दाव परे पासे का, सारि चलावे खिलकर।। —आनंदघन ग्रंथावली, पद : ५६ आत्मा ने स्वयं प्रसन्न होकर संसार रूप चौपड़ को खेलने के लिए राग—द्वेष और मोह रूप पासे बना लिए हैं। जैसे पासा आता है, उसी के अनुसार…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == आत्मा : == अंतरतच्चं जीवो, बाहिरतच्चं हवंति सेसाणि। — कार्तिकेयानुप्रेक्षा : २०५ जीव (आत्मा) अन्तस्तत्त्व है, बाकी सब द्रव्य बहिस्तत्त्व है। सुण्णीकयम्मि चित्ते, णूणं अप्पा पयासेइ। —आराधनासार : ७४ चित्त को (विषयों से) शून्य कर देने पर उसमें आत्मा का प्रकाश झलक उठता है। कत्ता भोत्ता आदा, पोग्गलकम्मस्स होदि ववहारो। —नियमसार…