आज्ञा :!
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार]] == आज्ञा : == गुर्वाज्ञाकरणं हि सर्वगुणेभ्योऽतिरिच्यते। —त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित : १-८ गुरु—आज्ञा का पालन करना सब गुणों से बढ़कर है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार]] == आज्ञा : == गुर्वाज्ञाकरणं हि सर्वगुणेभ्योऽतिरिच्यते। —त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित : १-८ गुरु—आज्ञा का पालन करना सब गुणों से बढ़कर है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == आत्मज्ञान : == कह सो घिप्पई अप्पा ? पण्णाए सो उ घिप्पए अप्पा। —समयसार : २९६ यह आत्मा किस प्रकार जाना जा सकता है ? आत्म प्रज्ञा अर्थात् भेद विज्ञान रूप बुद्धि से ही जाना जा सकता है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == अहिंसा : == सव्वेसिमासमाणं हिदयं गब्भो व सव्व सत्थाणं। —भगवती आराधना : ७९० अहिंसा सब आश्रमों का हृदय है, सब शास्त्रों का गर्भ—उत्पत्तिस्थान है। जीववध आत्मवधो, जीवदयाऽत्मनो दया भवति। तस्माद् सर्वजीवहिंसा, परित्यक्ताऽऽत्मकामै:।। —समणसुत्त : १५१ जीव का वध अपना ही वध है। जीव की दया अपनी ही दया है। अत: आत्म—हितैषी…
[[श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == अहिंसक : == मरदु व जियदु व जीवो, अयदाचारस्स णिच्छिदा हिंसा। पयदस्स णत्थि बंधो, िंहसामेत्तेण समिदस्स।। —प्रवचनसार : ३-१७ ८०३ बाहर से प्राणी मरे या जीये, अयतनाचारी—प्रमत्त को अंदर से हिंसा निश्चित है। परन्तु जो अिंहसा की साधना के लिए प्रयत्नशील है, समिति वाला है, उसको बाहर में प्राणी की िंहसा होने…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == आचरण : == बहुगंपि सुदमधीदं किं काहदि अजाणमाणस्स। दीवविसेसो अंधे णाणविसेसो वि तह तस्स।। —मूलाचार : १०/६५ जो आचरणरहित है वह बहुत से शास्त्रों को भी पढ़ ले तो उसका वह शास्त्र ज्ञान क्या कर सकता है ? जैसे अंधे के हाथ में दीपक की कोई उपयोगिता नहीं होती, उसी प्रकार…
[[श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == आत्मादृष्टा : == अहमिक्को खलु सुद्धो, दंसणणाणमइयो सदारूवी। ण वि अत्थि मज्झ किंचि वि अण्णं परमाणुमित्तं पि।। —समयसार : ३८ आत्मद्रष्टा विचार करता है कि—‘‘मैं तो शुद्ध ज्ञान दर्शन स्वरूप, सदा काल अमूर्त, एक शुद्ध ज्ञान दर्शन स्वरूप, सदा काल अमूर्त, एक शुद्ध शाश्वत तत्त्व हूँ। परमाणु मात्र भी अन्य द्रव्य मेरा…
[[श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == आकाश : == चेतनारहितममूत्र्तं अवगाहनलक्षणं च सर्वगतम्। लोकालोकद्विभेदं, तद् नभोद्रव्यं जिनोद्दिष्टम्।। —समणसुत्त : ६३५ जिनेन्द्र देव ने आकाश द्रव्य को अचेतन, अमूर्त, व्यापक और अवगाह लक्षण वाला कहा है। लोक और अलोक के भेद से आकाश दो प्रकार का है। तस्य मुखोद्गतवचनं, पूर्वापरदोषविरहितं शुद्धम्। ‘आगम’ इति परिकथितं, तेन तु कथिता भवन्ति तत्त्वार्थ:।।…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == असत्य : == एकत: सकलं पापमसत्योत्थं ततोऽन्यत:। साम्यमेव वदन्त्यार्यास्तुलाया धृतयोस्तयो:।। —ज्ञानार्णव : १२६ एक ओर जगत् के समस्त पाप एवं दूसरी ओर असत्य का पाप—इन दोनों को तराजू में तोला जाय, तो बराबर होंगे—ऐसा आर्य पुरुष कहते हैं। मृषावाक्यस्य पश्चाच्च पुरस्ताच्च, प्रयोगकाले च दु:खी दुरन्त:। एवमदत्तानि समाददान:, रूपेऽतृप्ता दु:खितोऽनिश्र:।। —समणसुत्त :…
[[श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == असमय : == वियलिय धणाण दानं, जरजज्जर जुव्वणाण परिणयणं। मरणसरणाय धम्मो, किसिकम्मं सरयसमयम्मि।। —गाहारयण कोष : ६६ धन के नाश होने पर दान, यौवन के नष्ट होने पर विवाह, मृत्यु के समय धर्माचरण और शरदकाल में खेती—ये सब असमय हैं।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार]] == अविद्या : == यावन्तोऽविद्यापुरुषा:, सर्वे ते दु:खसम्भवा:। लुप्यन्ते बहुशो मूढा:, संसारेऽनन्तके।। —समणसुत्त : ५८८ समस्त अविद्यावान (अज्ञानी पुरुष) दु:खी हैं—दु:ख के उत्पादक हैं। वे विवेक—मूढ़ अनन्त संसार में बार—बार लुप्त होते हैं।