एकांत :!
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == एकांत : == णाणं किरियारहियं, किरियामेत्तं च दोवि एगंता। —सन्मतिप्रकरण : ३-६८ क्रियाशून्य ज्ञान और ज्ञानशून्य क्रिया, दोनों ही एकांत हैं। अर्थात् जैन दर्शन सम्मत नहीं है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == एकांत : == णाणं किरियारहियं, किरियामेत्तं च दोवि एगंता। —सन्मतिप्रकरण : ३-६८ क्रियाशून्य ज्ञान और ज्ञानशून्य क्रिया, दोनों ही एकांत हैं। अर्थात् जैन दर्शन सम्मत नहीं है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार]] == उपाध्याय : == अज्ञानघोरतिमिरे, दुरन्ततीरेहिण्डमानानाम्। भव्यानाम् उद्योतकरा, उपाध्याय वरमिंत ददतु।। —समणसुत्त : १० जिसका ओर—छोर पाना कठिन है, उस अज्ञान रूपी घोर अंधकार में भटकने वाले भव्य जीवों के लिए, ज्ञान का प्रकाश देने वाले उपाध्याय मुझे उत्तम मति प्रदान करें।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == इन्द्रिय—विषय : == सुष्ठ्वपि माग्र्यमाण:, कुत्रापि कदल्यां नास्ति यथा सार:। इन्द्रियविषयेषु तथा, नास्ति सुखं सुष्ठ्वपि गवेषितम्।। —समणसुत्त : ४७ बहुत खोजने पर भी जैसे केले के पेड़ में कोई सार नहीं दिखाई देता, वैसे ही इन्द्रिय–विषयों में भी कोई सुख दिखाई नहीं देता।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == आवश्यक : == परित्यक्त्वा परभावं, आत्मानं ध्यायति निर्मलस्वभावम्। आत्मवश: स भवति खलु, तस्य तु कम्र्म भणन्ति आवश्यकम्।। —समणसुत्त : ४१७ परभाव का त्याग करके निर्मल—स्वभावी आत्मा का ध्याता आत्मवशी होता है। उसके कर्म को ‘आवश्यक’ कहा जाता है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == आश्रय : == नीया वि समत्थेहिं गहिया उच्चं लहंति संठाणं। धूलिकणा पुहवीए चरंति गयणम्मि वाएण।। —गाहारयणकोष : १२० नीच व्यक्ति भी यदि बड़ों का सहारा लेते हैं तो ऊँचे पद तक पहुँच जाते हैं। जैसे पृथ्वी के धूलि—कण हवा का आश्रय पाकर आकाश में गमन करते हैं।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == उपवास : == उपशमनम् अक्षाणाम्, उपवास: र्विणत: समासेन। तस्मात् भुंजाना: अपि च, जितेन्द्रिया भवन्ति उपवासा:।। —समणसुत्त : ४४६ संक्षेप में इन्द्रियों के उपशमन को ही उपवास कहा गया है। अत: जितेन्द्रिय साधु भोजन करते हुए भी उपवासी ही होते हैं।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == कर्मबंध : == ण य वत्थुदो दु बंधो, अज्झवसाणेण बंधोत्थि। —समयसार : २६५ कर्मबंध वस्तु से नहीं, राग और द्वेष के अध्यवसाय—संकल्प से होता है। भोगामिषदोषण्ण: हितनि:श्रेयसबुद्धिविपर्यस्त:। बालश्च मन्दित: मूढ:, बध्यते मक्षिकेव श्लेष्मणि।। —समणसुत्त : ५० आत्मा को दूषित करने वाला भोगामिष (आसक्तिजनक भोग) में निमग्न, हित और श्रेयस में विपरीत…
[[श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार]] == आर्जव : == य: चिन्तयति न वक्र्म्, न करोति वव्रंâ न जल्पति वक्रम्। न च गोपयति निजदोषम् , आर्जवधर्म: भवेत् तस्य।। —समणसुत्त : ९१ जो कुटिल विचार नहीं करता, कुटिल कार्य नहीं करता, कुटिल वचन नहीं बोलता और अपने दोषों को नहीं छिपाता, उसके आर्जव—धर्म होता है
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] == आस्रव : == आस्रवद्वारै: सदा, हिंसादिक कर्मास्रवति। यथा नावो विनाशश्छिद्रै: जलम् उदधिमध्ये।। —समणसुत्त : ६०२ हिंसा आदि आस्रव द्वारों से सदा कर्मों का आस्रव होता रहता है। जैसे कि समुद्र में जल के आने से सछिद्र नौका डूब जाती है। मिच्छत्ताविरदी वि य, कसायजोगा य आसवा होंति। —जयधवला : १-९-५४ मिथ्यात्व,…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार]] == आत्मबोध : == वदणियमाणि धरंता, सीलाणि तहा तवं च कुव्वंता। परमट्ठबाहिरा जे, णिव्वाणं ते ण विदंति।। —समयसार : १५३ भले ही व्रत, नियम को धारण करे, तप और शील का आचरण करे, किन्तु जो परमार्थ रूप आत्मबोध से शून्य है, वह कभी निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकता।