द्रव्य पाप!
द्रव्य पाप Sinful nature of Karmas (substantive sin). कर्म की पाप रूप 100 प्रकृतियां ।[[श्रेणी: शब्दकोष ]]
द्रव्य पाप Sinful nature of Karmas (substantive sin). कर्म की पाप रूप 100 प्रकृतियां ।[[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] श्रीपर्वत – Shreeparvata. Name of a mountain of Bharat Kshetra (region). भरत क्षेत्र का एक पर्वत ” लंका को जीतकर राम ने यहाँ का साम्राज्य हनुमान को दिया था “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संयोगाक्षर – Sanyogaaksara. Combination of syllables i.e. formation of words. अक्षरों के संयोग से बना शब्द “
द्रव्य ध्येय To concentrate mind on the virtuous matters. अध्यात्म वेत्ताओं के अनुसार 4 प्रकार के ध्येय पदार्थों में एक सत् या गुणपर्यायवान् पदार्थ में एकाग्र होना।[[श्रेणी: शब्दकोष ]]
दक्षिणाग्नि A sacred fire of square fire-pit. चैकोर कुंड की अग्नि । [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
द्रव्य अप्रत्याख्यान Lust or desire for illusive matters. रागादि विषयों की आकांक्षा रूप अप्रत्याख्यान के दो भेदों में एक भेद।[[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संप्रदान कारक – Sanpradaana Kaaraka. The dative case in grammar. षट्कारकों में चतुर्थ कारक; कर्म जिसे देने में आवे अर्थात् जिसके लिए करने में आवे ” (के लिए, के अर्थ, के वास्ते) “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == निरभिमान : == जो ण य कुव्वदि गव्वं, पुत्तकलत्ताइसव्वअत्थेसु। उवसमभावे भवदि, अप्पाणं मुणदि तिणमेत्तं।। —कार्तिकेयानुप्रेक्षा : ३१३ जो पुत्र—कलत्रादि किसी का भी गर्व नहीं करता और अपने को तृण के समान मानता है, उसे उपशम—भाव होता है। रिद्धीसु होह पणंवा जइ इच्छह अत्तणो लच्छी। —कुवलयमाला : ८५ यदि…
द्यानतराय A writer who wrote number of books on Jainism. टागरा निवासी एक लेखक ‘पंडित’ जिन्होंने धर्मविलास, पूजापाठ व भक्ति स्तोत्र आदि अनेक ग्रंथों की रचना की। समय- ई. सन् 1676-1723।[[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] श्रद्धा – Shraddhaa. Faith, Reverence, Reverential belief. दृष्टि, श्रद्धा, आस्था, रूचि और प्रत्यय ये पर्यायवाची नाम हैं ” दाता के सात गुणों में एक गुण, पात्र के प्रति आदर भाव “