एकीभाव स्तोत्र
एकीभाव स्तोत्र एकीभावं गत इव मया य: स्वयं कर्म-बन्धो, घोरं दु:खं भव-भव-गतो दुर्निवार: करोति। तस्याप्यस्य त्वयि जिन-रवे! भक्तिरुन्मुक्तये चेज्- जेतुं शक्यो भवति न तया कोऽपरस्तापहेतु:।।१।। अर्थ - हे जिनेन्द्र! जबकि आपकी समीचीन भक्ति के द्वारा चिरपरिचित और अत्यन्त दु:खदायी एवं आत्मा के साथ दूध-पानी की तरह मिले हुए कर्मबंधन भी दूर किये जाते हैं तब...