आठर्वी पृथ्वी!
आठर्वी पृथ्वी The 8th earth (Siddhashila). सिद्धशिला ईषत्प्राग्भार-45 लाख योजन विस्तृत पृथ्वी।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
आठर्वी पृथ्वी The 8th earth (Siddhashila). सिद्धशिला ईषत्प्राग्भार-45 लाख योजन विस्तृत पृथ्वी।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विशालप्रभ – Vishalaprabha. Name of the 10th Jaina – Lord of Videh Kshetra (region). विदेह क्षेत्र के १० वें तीर्थकर का नाम “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == शल्य : == तत् शस्त्रं च विषं च, दुष्प्रयुक्तो वा करोति वैताल:। यन्त्रं वा दुष्प्रयुक्तं, सर्पो वा प्रमादिन: क्रुद्ध:।। यत् करोति—भावशल्य—मनुद्धृतमुत्तमार्थ—काले। दुर्लभबोधिकत्वम् , अनन्तसंसारिकत्वं च।। —समणसुत्त : ५७७-५७८ दुष्प्रयुक्त शस्त्र, विष, भूत तथा दुष्प्रयुक्त यन्त्र तथा क्रुद्ध सर्प आदि प्रमादी का उतना अनिष्ट नहीं करते, जितना अनिष्ट समाधिकाल…
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वसहाय – Svasahaya. Absolutely independent. स्त्। जो स्वभाव से ही सिद्व है, इसलिये वह अनादि अनंत है स्वसहाय है, निर्विकल्प है।
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मैथुन संज्ञा– Maithun Sangya. Sex instinct. 4 संज्ञाओ में एक संज्ञा; मैथुनरूप क्रियाओ में होने वाली इच्छा”
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भाव लोकोत्तर मान – Bhava Lokottara Mana. Extent of knowledge (Nigod to Supreme state). जघन्य से उत्क्रष्ट अवस्था तक का ज्ञान जिससे मापा जाय अर्थात् लब्ध्य-पर्याप्तक सूक्ष्म निगोदिया जीव के जघन्य पर्याय श्रुतज्ञान से लेकर अर्हतों के उत्क्रष्ट केवलज्ञान तक का प्रमाण “
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वर्णमध्य – Svarnamadhya. Another name of Sumeru mountain. सुमेरु पर्वत का अपरनाम।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सन्यास मरण – Sanyaasa Marana. The holy death of an ascetic. मुनि व्रत धारण कर पंडित मरण करना
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वरुप विपर्यास – Svaruupa Viparyaasa. A contary viewpoint regarding the form of a matter. मिथ्यात्व। जिस पदार्थ का जो लक्षण है उससे विपरीत उसका स्वरुप समझना।
[[श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[श्रेणी:शब्दकोष]] == कायक्लेश : == सुखेन भावितं ज्ञाने, दु:खे जाते विनश्यति। तस्मात् यथाबलं योगी, आत्मानं दु:खै: भावयेत्।। —समणसुत्त : ४५३ सुखपूर्वक प्राप्त किया हुआ ज्ञान दु:ख के आने पर नष्ट हो जाता है। अत: योगी को अपनी शक्ति के अनुसार दु:खों के द्वारा अर्थात् कायक्लेशपूर्वक आत्म-चिन्तन करना चाहिए।