परदातृव्यपदेश!
[[श्रेणी: शब्दकोष]] परदातृव्यपदेश:An infraction of vow of hospitality to donate indirectly and deceitfully.अतिथिसंविभाग व्रत का एक अतिचार पात्र को स्वयं दान न कर दूसरे से कहकर दिलवाना या दूसरे की वस्तु लाकर देना।
[[श्रेणी: शब्दकोष]] परदातृव्यपदेश:An infraction of vow of hospitality to donate indirectly and deceitfully.अतिथिसंविभाग व्रत का एक अतिचार पात्र को स्वयं दान न कर दूसरे से कहकर दिलवाना या दूसरे की वस्तु लाकर देना।
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वाभाविक शक्ति – ैअंइींअपां ैंाजपण् छंजनतंस चवूमत वत ेजतमदहजी पद जीम दंजनतम व िउंजजमतण् द्रव्य के स्वभावो मे स्वाभाविकी शक्ति होती है। देखे- स्वाभाविक क्रिया।
त्रस नामकर्म प्रकृति Mobile physique making karmic nature . जिस कर्म के उदय से त्रस काय में जन्म हो। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वहिंसा – Svahimsaa. Passionate feelings as volitional violence. भावहिंसा-प्रमाद से युक्त आत्मा पहिले स्वंय अपने द्वारा ही अपना द्यात करता है अर्थात् रागादि प्रमाण भाव ही स्वहिंसा है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सांपरायिक आस्त्रव – Saamparaayika Aasrava. Passionful influx. स्वामी की अपेक्षा आस्त्रव के दो भेदो मे एक भेद। कषाय सहित होने वाले आस्त्रव को साम्परायिक आस्त्रव कहते हैं पहले से दसवें गुणस्थान तक सांपरायिक तक सांपरायिक आस्त्रव होता है। इसके 57 भेद है- 5 मिथ्यात्व, 5 अविरति, 15 प्रमाद, 25 कषाय, 7 योग।
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मोह– Moha. Delusion, Attachment. सांसारिक वस्तुओ में ममत्व या मूर्छा भाव”
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रतिष्ठासार संग्रह- एक प्रतिश्ठा सम्बन्धी ग्रंथ का नाम। pratisthasara samgraha – name of ritual treatise
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विध्यात संक्रमण – Vidhyata Sankramana. A type of transition (reg. soul with low purity). संक्रमण के ५ भेदों में एक भेद; मंद विशुध्दता वाले जीव की स्थिति – अनुभाग को घटाने रूप भूतकालीन स्थितिकाण्डक – अनुभागकाण्डक तथा गुणश्रेणी आदि परिणामों में प्रव्रत्ति होना “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रतिष्ठापना शुद्धि- देष व काल को जानकर नख, रोम, नाक, थमक, वीर्य, मल, मूत्र या देह परित्याग में जन्तु बाधा का परिहार करके प्रवृत्ति करना। pratisthapana suddhi – careful act of excretion
[[श्रेणी :शब्दकोष]] यत्याचार–Yatyachar. Name of a book written by Acharya Padmanandi – 7, Well conduct of saints, Great treatises containing description of saints’ conduct. आचार्य पद्मनंदी -7(ई. 1305) की एक रचना,साधुओ के आचार-विचार को यत्याचार कहते है” जिन ग्रंथों में यतियों के आचार आदि का वर्णन हो वे भी यत्याचार कहलाते है” जैसे- मूलाचार, भगवती…