प्रत्यक्षबाधित!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रत्यक्षबाधित- pratyaksabadhita Refutable perception जिस साध्य की सिद्धी में प्रत्यक्ष से बाधा आये, जैसे अगिन ठंडी है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रत्यक्षबाधित- pratyaksabadhita Refutable perception जिस साध्य की सिद्धी में प्रत्यक्ष से बाधा आये, जैसे अगिन ठंडी है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == महाव्रत : == अहिंसा सत्यं चास्तेनवंâ च, ततश्चाब्रह्मापरिग्रहं च। प्रतिपद्य पंचमहाव्रतानि, चरति धर्मं जिनदेशितं विद:।। —समणसुत्त : ३६४ अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ये पांच महाव्रत ग्रहण कर श्रमण जिनदेशना के अनुसार धर्म का आचरण करे।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] ललितांग देव – सल्लेखना के प्रभाव से उत्पन्न एषान स्वर्ग का देव। ये ऋशभदेव भगवान के पूर्व का 9 वा भव है। Lalitamga Deva-Name of a heavenly deity, The pre birth soul of Lord Rishabdev
[[श्रेणी : शब्दकोष]] बालिश्त – Balista. An area unit क्षेत्र का प्रमाण विशेष ” अपरनाम वितस्ति “
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वसमय प्रवृत्ति – Svasamaya Pravrtti. Engrossment into self. स्वरुप मे चरण करना चारित्र है, स्वसमय मे प्रवृत्ति करना इसका अर्थ है। देखे-स्वसमय।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] लिंगशुद्धि – कर्मो को निर्मूल करना एवं जिनदेव कथित धर्म पर परमार्थभूत भक्ति प्रेम रखना।ऐसा करने वाले मुनियो में लिग शुद्धि होती है। Limgasuddhi-Absolute purity of the mind of a saint
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == जिनवाणी : == जिनवचनमौषधमिदं, विषयसुखविरेचनम् अमृतभूतम्। जरामरणव्याधिहरणं, क्षयकरणं सर्वदु:खानाम्।। —समणसुत्त : १८ जिनवाणी वह अमृत समान औषधि है, जो विषय—सुखों का विरेचन करती है, जरा व मरण की व्याधि को दूर करती है और सभी दु:खों का क्षय करती है। लब्धमलब्धपूव, जिनवचन—सुभाषितं अमृतभूतम्। गृहीत: सुगतिमार्गो, नाहं मरणाद् बिभेमि।।…
[[श्रेणी: शब्दकोष]] स्वर्णनाभ – Svarnanaabha. Name of the 17th city in the south of Vijayardha mountain, name of a king of Arishtapur. विजयार्ध की दक्षिण श्रेणी का 17वां नगर, अस्ष्टिपुर नगर का राजा। कृष्ण की रानी पद्यावती का पिता।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संसारी – Sansaaree. Wordly beings. आठों कर्मों से लिप्त जीव अर्थात् जिन्होंने स्वभाव को प्राप्त नही किया है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संध्या – Sandhyaa. Evening, Joining period of night-morning, morning-afternoon & evening-night (i.e. dawn, mid-joining & dusk). शाम ” प्रातः,मध्यान्ह,सायंकाल के संधिकालों को संध्या कहते हैं ” इन संधिकालों में वंदना एवं सामायिक की जाती है “