विनयोपसंयत!
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विनयोपसंयत – Vinayopasamyata. Reverential & respectful welcome (of saints rtc.). अन्य संघ से आये हुए मुनियों को आसनदान, प्रियवचन, पुस्तक आदि दान करके आदर करना “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विनयोपसंयत – Vinayopasamyata. Reverential & respectful welcome (of saints rtc.). अन्य संघ से आये हुए मुनियों को आसनदान, प्रियवचन, पुस्तक आदि दान करके आदर करना “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संकलन श्रेणी व्यवहार – Sankalana Shreni Vyavahaara. Integral series of numbers. गणित विषयक एक संकलन व्यवहार की श्रेणी = 4+8+12+16+20+24+28+32=144 “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संसरण – Sansarana. Movement, Worldly wandering, birth & death cycle of beings. गमन, संसार में जन्म मरण करने का नाम संसरण है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] षोडशकारण भावना व्रत – Sodashakaarana Bhaavanaa Vrata. A particular & procedural vow (fasting). उत्कृष्ट 16 वर्ष, मध्यम 5 वर्ष, जघन्य 1 वर्ष तक प्रतिवर्ष भाद्रपद, माघ, व चैत्र इन 3 महीनों में कृ. 1 से लेकर अगले महीने की कृ. 1 तक 32 दिन तक 16 उपवास, 16 पारणा करना एवं “दर्शनविशुद्धयादि षोडशकारणेभ्यो नमः”…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] बंध विधान- प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश के भेद से भेद को प्राप्त हुए बन्ध के भेदों को बंध विधान कहते है। Bandha Vidhana- Constitution of Karmic binding
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भाव स्थिति – Bhava Sthiti. Constant nature. जिसका जो स्वभाव है उससे च्युत न होना “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] षड्दिक् गति – Saddika Gati. Six directional motion of beings, binded with Karmas. कर्मबद्ध जीवों का कर्मनिमित्तक षट्दिक अर्थात 6 दिशाओं में गमन होना “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रासुक- जिसमे से एकेनिद्रय स्थावर जीव निकल गये हैं वह प्रासुक द्रव्य कहलाता है। Prasuka- Sterilized, boiled water, milk etc.
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संवृति सत्य – Sanvrti Satya. A type of true speech, denoting one prominent among many objects. सत्य वचन के 10 भेदों में एक भेद ” समुदाय को एक देश की मुख्यता से एक रूप कहना ” जैसे-जहां अनेक वाद्यों का शब्द एक समूह में हो रहा है वहां भेरी आदि की मुख्यता से भेरी…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] षट्खंडागम – Satkhandaagama. Six parts of great Jaina philosophical literature containing Karmic theory. कर्म सिद्धांत विषयक ग्रंथ; इसकी उत्पत्ति मूल द्वादशांग श्रुतस्कंध से हुई है ” इसके 6 खंड हैं (देखे- षट्खंड टीका) ” पहले खण्ड के सूत्र पुष्पदंत आचार्य (ई. 106-136) के बनाये हुए हैं, उनका शरीरान्तहो जाने के कारण शेष 4 खण्डों…