वारसणुपेक्खा (श्री कुन्द्कुंदाचार्यकृत) श्री कुंदकुंद आचार्य द्वारा रचित बारसणुपेक्खा नामके ग्रन्थ से यहाँ द्वादश अनुप्रेक्षाओं का वर्णन प्रस्तुत किया जा रहा है । मंगलाचरण और प्रतिज्ञावाक्य णमिऊण सव्वसिद्धे झाणुत्तमखविददीहसंसारे । दस दस दो दो व जिणे दस दो अणुपेहणं बोच्छे ।।१।। जिन्होंने उत्तम ध्यान के द्वारा दीर्घ संसार का नाश कर दिया है ऐसे समस्त…
श्री मांगीतुंगी जी दिगम्बर सिद्धक्षेत्र की प्राचीनता का प्रत्यक्ष दर्शन राम, हनु, सुग्रीव सुडील, गव गवाक्ष, नील—महानील। कोटि निन्यानवै मुक्ति पयान, तुंगीगिरि बंदौ धरि ध्यान।। यह वही अद्वितीय भूमि है जो प्राचीन काल से पुरातन स्मृतियों की याद दिला रही है । करोड़ों चंद्र, सूर्यों के प्रकाश से अधिक तेज केवल ज्ञानरूपी उत्कृष्ट ज्योति को…
विदेशों में जैनधर्म एवं समाज वरिष्ठ जैन समाजसेवी एवं श्रेष्ठि श्री त्रिलोकचंद कोठारी ने भारत एवं विदेशों में जैन धर्म के प्रचार से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों को प्रस्तुत आलेख में संकलित किया है। अमेरिका, फिनलैण्ड, सोवियत गणराज्य, चीन एवं मंगोलिया, तिब्बत, जापान, ईरान, तुर्किस्तान, इटली, एबीसिनिया, इथोपिया, अफगानिस्तान, नेपाल, पाकिस्तान आदि विभिन्न देशों में किसी…
४. सल्लेखना मनुष्य आदि पर्याय का नाश होना मरण है। इस मरण के पाँच भेद हैं-पंडितपंडितमरण, पंडितमरण, बालपंडितमरण, बालमरण और बालबालमरण। पंडितपंडितमरण – क्षीणकषाय केवली भगवान्, पंडितपंडितमरण से मरण करते हैं अर्थात् केवली भगवान अयोगी होकर इस मनुष्य पर्याय से छूटकर कर्मों से ही छूट जाते हैं पुन: भव धारण नहीं करते हैं। पंडितमरण –…
अभीक्ष्णज्ञानोपयोग भावना सोलह कारण भावना ज्ञानभावनायां नित्ययुक्तता ज्ञानोपयोग:।।४।। जीवादि पदार्थों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जानने वाले मति, श्रुत, अवधि आदि पाँच ज्ञान हैं। इनमें से जो जिनेन्द्र भगवान् के मुखकमल से निकले हुए वचन हैं, उन्हें ही गणधर आदि ऋषियों ने आगम रूप से गूँथा है। उन्हीं की परम्परागत अंश आज भी ग्रंथों…
संवेग भावना सोलह कारण भावना संसार दु:खन्नित्यभीरुता संवेग:।।५।। शारीरिक, मानसिक आदि अनेक प्रकार के दु:ख हैं। इनसे तथा प्रिय वियोग, अप्रिय संयोग और इष्ट के अलाभ आदि रूप सांसारिक दु:खों से नित्य ही भयभीत रहना संवेग है। हमेशा संसार और शरीर के स्वरूप का विचार करते रहने से यह संवेग भाव उत्पन्न होता है। श्री…
कर्म, कषाय एवं पेज्जदोष विभक्ति भारत में आस्तिकता की कसौटी इस जीवन की कड़ी को परलोक के जीवन से जोड़ देना है। जो मत इस जीवन का अतीत और भाविजीवन से सम्बन्ध स्थापित कर सके हैं वे ही प्राचीन समय में इस भारतभूमि पर प्रतिष्ठित रह सके हैं। यही कारण है कि चार्वाकमत आत्यन्तिक तर्कबल…