सुदर्शन मेरु स्तुति शंभु छंद श्रीमेरु सुदर्शन के ऊपर, सोलह चैत्यालय भास रहे।उसमें क्रमश: वन भद्रसाल, नंदन सौमनसरु पांडुक हैं।। चारों वन के चारों दिश में, शुभ चार-चार जिनमंदिर हैं।प्रति जिनमंदिर में जिनप्रतिमाएँ, इकसौ आठ प्रमाण कहें।।१।। ये इंद्रिय सुख से रहित अतीन्द्रिय, ज्ञान सौख्य संपतिशाली।सब रागद्वेष विकाररहित, जिनवर प्रतिमा महिमाशाली।। तनु बीस हजार हाथ...
पंचकल्याणक वंदना सोरठा जय जय श्री जिनराज, पृथ्वी तल पर आवते। बरसें रत्न अपार, सुरपति मिल उत्सव करें।।१।। शंभु छंद प्रभु तुम जब गर्भ बसे आके, उसके छह महिने पहले ही। सौधर्म इंद्र की आज्ञा से, बहुरतनवृष्टि धनपति ने की।। मरकतमणि इंद्र नीलमणि औ, वरपद्मरागमणियाँ सोहें। माता के आँगन में बरसे, मोटी धारा जनमन मोहें।।२।।...
पंचपरमेष्ठी वंदना (चाल-हे दीनबन्धु....।) जैवंत अरिहंत देव, सिद्ध अनंता । जैवंत सूरि उपाध्याय साधु महंता ।। जैवंत तीन लोक में ये पंचगुरु हैं । जैवंत तीन काल के भी पंचगुरु हैं ।।1।। अरिहंत देव के हैं छियालीस गुण कहे । जिन नाम मात्रा से ही पाप शेष ना रहे ।। दशजन्म के अतिशय हैं चमत्कार...
जन्मकल्याणक वन्दना जै जै जिनेन्द्र आपने अब जन्म था लिया। संपूर्ण लोक में महा आश्चर्य भर दिया।। सुरगृह में कल्पवृक्ष पुष्पवृष्टि कर झुवें। देवों के सिंहासन भी आप आप वंप उठें।।१।। शीतल सुगंध वायु मंद मंद बही थी। पृथ्वी भी तो हिलने से मनों नाच रही थी।। संपूर्ण दिशायें गगन भी स्वच्छ हुये थे। सागर...
सोलह कारण स्तुति दोहा स्वातमरस पीयूष से, तृप्त हुये जिनराज।सोलह कारण भावना, भाय हुये सिरताज।।१।। सोमवल्लरी छंद (चामर) दर्श की विशुद्धी जो पचीस दोष शून्य है।आठ अंग से प्रपूर्ण सात भीति शून्य है।। सत्य ज्ञान आदि तीन रत्न में विनीत जो।साधुओं में नम्रवृत्ति धारता प्रवीण वो।।२।। शील में व्रतादि में सदोषवृत्ति ना धरें।विदूर अतीचार से...
गर्भकल्याणक वन्दना सोरठा जय जय श्री जिनराज, पृथ्वी तल पर आवते। बरसें रत्न अपार, सुरपति मिल उत्सव करें।।१।। शंभु छंद प्रभु तुम जब गर्भ बसे आके, उसके छह महिने पहले ही। सौधर्म इंद्र की आज्ञा से, बहुरतनवृष्टि धनपति ने की।। मरकतमणि इंद्र नीलमणि औ, वरपद्मरागमणियाँ सोहें। माता के आँगन में बरसे, मोटी धारा जनमन मोहें।।२।।...
(१९) सम्मेद शिखर स्तुति चिन्मूरति चिंतामणि, चिन्मय ज्योतीपुंज।मैं प्रणमूं नित भक्ति से, चिन्मय आतमकुंज।।१।। शंभु छन्द जय जय सम्मेदशिखर पर्वत, जय जय अतिशय महिमाशाली।जय अनुपम तीर्थराज पर्वत, जय भव्य कमल दीधितमाली१।। जय कूट सिद्धवर धवलकूट, आनंदकूट अविचलसुकूट।जय मोहनकूट प्रभासकूट, जय ललितकूट जय सुप्रभकूट।।२।। जय विद्युत संकुलकूट सुवीरकूट स्वयंभूकूट वंद्य।जय जय सुदत्तकूट शांतिप्रभ, कूट ज्ञानधरकूट वंद्य।।...
दीक्षाकल्याणक वन्दना सोरठा नित्य निरंजन देव, परमहंस परमातमा। करूँ चरण की सेव, तुम गुणमाला गायके।।१।। नरेन्द्र छंद चिन्मय ज्योति चिदंबर चेतन, चिच्चैतन्य सुधाकर। जय जय चिन्मूरत चिंतामणि, चितितप्रद रत्नाकर।। जब तुमको वैराग्य प्रकट हो, सुरपति आसन कंपे। लौकांतिक सुरगण भी आते, पुष्पांजलि को अर्पें।।२।। तीर्थंकर भगवान स्वयं ही दीक्षा लेते वन में। सिद्धों की साक्षी...