पू0 आर्यिका ज्ञानमती : व्यक्तित्व एवं कृतित्त्व जीवन परिचय :- नियमसार की स्याद्वाद चन्द्रिका संस्कृत टीका की रचयित्री पू० गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माता जी भारत एवं विषेश तौर से दि० जैन समाज की अनुपम निधि हैं। वे पूर्व जन्म से ही अत्यन्त पुण्यात्मा है। आपका जन्म “शरद पूर्णिमा के दिन संवत् 1991 की विक्रमी (22…
मंगलशान्ति जिनस्तवन समग्रतत्वदर्पणम् विमुक्तिमार्गघोशणम् कशायमोहमोचनं नमामि षान्तिजिनवरम् ।।1।। नमामि त्रिलोकवन्द्यभूशणं भवाब्धिनीरषोशणं जितेन्द्रयं अजं जिनं नमामि षान्तिजिनवरम् ।।2।। अखण्डखण्डगुणधरं प्रचण्डकामखण्डनं सुभव्यपदिनकरं नमामि षान्तिजिनवरम् ।।3।। एकान्तवादमतहरं सुस्याद्वादकौषलं मुनीन्द्र्रवृन्दसेवितं नमामि षान्तिजिनवरम् ।।4।। नृपेन्द्रचक्रमण्डनं प्रकर्मचक्रचूरणं सुधर्मचक्रचालकं नमामि षान्तिजिनवरम् ।।5।। अग्रन्थनग्नकेवलं विमोक्षधामकेतनं अनिश्टघनप्रभत्र्जनं नमामि षान्तिजिनवरम् ।।6।। महाश्रमणमकित्र्चनं अकामकामपदधरं सुतीर्थकर्तृशोडषं नमामि षान्तिजिनवरम् ।।7।। महाव्रतन्धरं वरं दयाक्षमागुणाकरं सुदृश्टिज्ञानव्रतधरं नमामि षान्तिजिनवरम् ।।8।।नमामि…
लक्ष्मण द्वारा रावण का वध उसी युद्ध भूमि में चारों तरफ से सफाई करके विद्याधर लोग तम्बू लगाकर शिविर बना देते हैंं। पहले गोपुर के दरवाजे पर राजा नल, दूसरे पर नील, तीसरे पर विभीषण, चौथे पर कुमुद, पाँचवें पर सुषेण, छठे पर सुग्रीव और सातवें द्वार पर स्वयं भामंडल हाथ में नंगी तलवार लेकर…
शरीराष्टक ।।चौबीसवाँ अधिकार।। (१) दुर्गंध और अपवित्र धातु रूपी भीतों से बना हुआ। यह तन रूपी झोपड़ा है जो वह चर्म धातु से ढ़का हुआ।। अरु इसमें क्षुधा आदि दुखमय चूहों ने छिद्र बना रखे। अत्यन्त क्लिष्ट मल मूत्रादिक से भरा हुआ क्यूं शुचि समझे।। इसके चउ तरफ जरा रूपी अग्नी जल रही…
करुणाष्टक ।।बीसवाँ अधिकार।। (१) हे त्रिभुवनगुरु कर्मारिजयी! परमानंद मुक्ती के दाता। मुझकिकर पर करुणा करिए निज सम कर लो जग के त्राता।। (२) हे घातिकर्मनाशक अर्हन्! जग के बहु दुख से खिन्न हूँ मैं। मुझ दीन पे ऐसी दया करो नहिं जन्म मरण अब पाऊँ मैं।। (३) हे प्रभो!…
श्री मज्जिनेन्द्र स्तोत्र ( पद्मनंदि पंचविंशतिका ग्रन्थ से ) ।।चौदहवाँ अधिकार।। (१) हे प्रभो ! आपके दर्शन से ही नेत्र सफल हो जाते हैं। मेरा मन अरु मेरा शरीर अमृत से सींचे जाते हैं।। (२) जिस तरह अंधेरे में मानव को रूप न कोई दिखता है। वैसे ही मोह अंधेरा…
श्री शांतिनाथ स्तोत्र ।।अट्ठारहवाँ अधिकार।। (१) जिनके सिर पर इंद्रों द्वारा त्रय छत्र सुशोभित होते हैं। त्रैलोक्यपति हैं शांतिनाथ इस बात को सूचित करते हैं।। जिनने निज केवलज्ञान की उज्जवल कांति से सूर्य प्रभा को भी। लज्जित कर दिया तथा कर्मों से रहित करे हम सबको भी।। ऐसे श्री शांतिनाथ भगवन हम सबकी…
जिन पूजाष्टक उन्नीसवाँ अधिकार (१) जीवों के आश्रित जन्म जरा और मरण रूप त्रय अग्नी है। संताप बहुत देने वाली अग्नी जैसे दुख देती है।। उन तीन अग्नि के शांति हेतु त्रयधारा क्षेपण करता हूँ। जिन प्रभु के चरणों के आगे जलधारा अर्पण करता हूँ।। जलम्।। (२) जैसे भगवन के वचन…
एकत्वाधिकार का वर्णन ।।चतुर्थ अधिकार।। (१) जो परमात्मा चैतन्यरूप आनंद स्वरूप कहा मुनि ने। जो नित्य और शाश्वत आत्मा है रहित क्रूधादिक कर्मों से।। ऐसा परमात्मा मुझे और सबको सुख शांति प्रदान करे। एकत्व अधिकार के वर्णन करने की भी शक्ति प्रदान करे।। (२) जो पुद्गल धर्म अधर्म और आकाश काल…